सृष्टि-चक्र (एडवांस कोर्स)

सृष्टि-चक्र के चित्र में बेसिक नॉलेज के बतौर शॉर्ट में बताया जाता है कि यह स्वस्तिका की 4 भुजाओं का एक चक्र है जो चार युगों में बाँटा हुआ है। 1250-1250 वर्ष की ये 4 भुजायें 4 युगों को सूचित करती हैं। जिसमें दो भुजायें राइट हैंड की ओर और दो भुजायें लेफ्ट हैंड की ओर हैं। राइट हैंड की दो भुजायें सतयुग-त्रेतायुग, स्वर्ग की सूचक हैं और लेफ्ट हैंड की दो भुजायें द्वापरयुग-कलियुग, नरक की सूचक हैं। नरक के बाद स्वर्ग और स्वर्ग के बाद नरक, यह ढाई-ढाई हज़ार वर्ष के बाद परिवर्तन होता रहता है; लेकिन नरक की दुनिया को स्वर्ग बनाने के लिए बीच में है कलियुग अंत का संगम, जो छोटे से तीर के द्वारा दिखाया गया है।

यह 50-60 वर्ष का संगमयुग है जिसमें कलियुग को बदलकर संकल्पी सतयुग की स्थापना की जाती है। यह 5000 वर्ष का चक्र ज्यों का त्यों घूमता रहता है; लेकिन इस बेसिक नॉलेज को लेकर जब मुरलियों की गहराई में उतरा जाता है तो ढेर सारी नई-नई बातें निकलती हैं, जैसे बाबा कहते हैं- स्वदर्शन चक्र फिराते रहो। (मु.24.6.85 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें यह चार युगों चक्र है। इसमें हमारी आत्मा कैसे चक्र लगाती है? यह है स्व आत्मा के 84 जन्मों के चक्र का दर्शन। तो मुरलियों की गहराई में जाने से, मनन-चिंतन-मंथन में जाने से ढेर ऐसी बातें निकलती हैं जिससे शास्त्रों का सारा ज्ञान क्लीयर हो जाता है। बाबा ने मुरली में बताया हुआ है कि -यह 5000 वर्ष का ड्रामा है।... यह बेहद का अनादि बना-बनाया ड्रामा का खेल है। जो रिपीट होता रहता है; इसलिए इसको अनादि अविनाशी वर्ल्‍ड ड्रामा कहा जाता है।(मु.ता.4.6.68 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें

इसकी शूटिंग कब होती है? संगमयुग में। इसलिए संगमयुग को बाबा ने सर्वश्रेष्ठ युग कहा है। तारीख 30.5.73 पृ.77अंत, 78आदि की अव्यक्त वाणी में कहा है कि इस संगमयुग को पुरुषोत्तम संगमयुग व सर्वश्रेष्ठ युग क्यों कहते हो? क्योंकि आत्मा के हर प्रकार के धर्म की, राज्य की, श्रेष्ठ संस्कारों की, श्रेष्ठ सम्बंधों की और श्रेष्ठ गुणों की सर्वश्रेष्ठता अभी रिकॉर्ड के समान भरता जाता है। 84 जन्मों की चढ़ती कला और उतरती कला, उन दोनों के संस्कार इस समय आत्मा में भरते हो। रिकॉर्ड भरने का समय अभी चल रहा है।... आप बेहद का रिकॉर्ड भरने वाले, सारे कल्प का रिकॉर्ड भरने वाले, क्या हर समय इन सभी बातों के ऊपर अटेंशन देते हो? मुरली प्रूफ देखें

संगमयुग में शूटिंग का पीरियड भी निश्चित है। 4 सीन्स की शूटिंग का हिसाब, रिकॉर्डिंग का हिसाब या रिहर्सल का हिसाब बाबा ने मुरलियों में बता दिया है। कहीं बोला है कि संगमयुग 40 साल का है, कहीं बोला है 50 साल का है, कहीं 50/60 साल का है तो 40 साल के लिए मुरली में भी बोला है कि बाप कहते हैं मैं आता हूँ 40/50 वर्ष। (मु.9.4.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें 50 साल के लिए बोला है

संगमयुग कोई बड़ा नहीं है, 50 वर्ष का है। (मु.20.2.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें

थोड़ा समय 50/60 वर्ष लगते हैं पूरी राजधानी स्थापना में।(मु. 24.7.72 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें

और कहीं बोला है- अभी है संगमयुग। इसको 100 वर्ष देने चाहिए। (मु. 5.11.71 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें

इस तरह 3-4 तरीके से बाबा ने मुरली में बताया हुआ है। तो बाबा के ऐसे अलग-2 महावाक्यों से मूँझने की बात नहीं है। मुरलियों के प्रसंग के अनुसार बाबा ने जहाँ 40 साल बताया वो भी ठीक और जहाँ 100 साल बताया वो भी ठीक।

सन 1936/1937 से ज्ञान यज्ञ शुरू हुआ, तब से संगमयुग की शुरुआत हुई। संगमयुग की आयु चाहे 40 साल की हो, 50 साल की हो, 60 साल की हो या 100 साल की हो; संगमयुग की शुरुआत तो सन् 1936/1937 से ही मानेंगे। 40 साल सतयुगी शूटिंग के हिसाब से है (अर्थात्) संगमयुग की आयु जो 40 वर्ष की है वो सूर्यवंशी आत्माओं से संबंधित है। 1976/1977 तक सूर्यवंशी सतोप्रधान देवता वर्ण की आत्माएँ ज्ञान में आती रहती हैं। जैसे शूटिंग का सारा हिसाब है वैसे ब्राड ड्रामा का सारा हिसाब बनता है। 5000 वर्ष के ब्राड ड्रामा में जब एक्यूरेट सतयुग की शुरुआत होती है तो परमधाम घर से आत्माएँ क्रमशः उतरती रहती हैं और यहाँ कलियुग अंत होते ही शूटिंग पीरियड में आत्माएँ अज्ञान की दुनिया (कब्र) से ज्ञान की स्टेज में जागती हैं अर्थात् ज्ञान में उनका आना होता है, जैसे सुषुप्ति से जागृत अवस्था में आना होता है। जैसे परमधाम में आत्मा सुषुप्त पड़ी रहती है और सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकर जागृत हो जाती है, ऐसे ही इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर द्वापर से लेकर कलियुग के अंत तक सब आत्माएँ जैसे अज्ञान निद्रा में सो जाती हैं। परमात्मा आकर उनको ज्ञान का संदेश देकर कब्रदाखिल से जगाते हैं। 40 वर्ष जो पहली भुजा दिखाई गई है (सतयुग का फर्स्‍ट सीन) उसकी शूटिंग से संबंधित है। 40 साल पूरे होने पर सन् 76 में सतयुगी शूटिंग का कार्य सम्पन्न हो जाता है।

बच्चे जानते हैं पुरुषोत्तम संगमयुग की आयु बहुत थोड़ी है। 40 वर्ष से अभी बाकी 8 वर्ष रही है।... तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। 32 वर्ष तो चला गया। यह पुरुषोत्तम संगमयुग सबसे हीरे जैसा है। मोस्ट वैल्युएबल है। (मु.ता.18.9.68 पृ.1 आ.) मुरली प्रूफ देखें 40 साल का संगम जो बताया गया वो प्रजापिता ब्रह्मा की 100 वर्ष आयु से भी संबंधित है। मु.ता.16.10.84 पृ.2 के अंत में बाबा ने बोला है - ब्रह्मा की आयु मृत्युलोक में खत्म होगी।

मुरली प्रूफ देखें जब ब्रह्मा की 100 वर्ष आयु पूर्ण हो जाये तब मृत्युलोक में ब्रह्मा समाप्त हो जाता है। ऐसा बाबा ने मुरलियों व अव्यक्तवाणी में बोला हुआ है। ता.21.1.69पृ.21 की अ.वा.मध्य में ये भी कहा है- आप सोचते होंगे कि लोग पूछेंगे कि आपका ब्रह्मा 100 वर्ष से पहले ही चला गया? यह तो बहुत सहज प्रश्‍न है कोई मुश्किल नहीं। 100 वर्ष के नज़दीक ही तो आयु थी। यह जो 100 वर्ष कहे हुए हैं यह गलत नहीं है। अगर कुछ रहा हुआ है तो आकार द्वारा पूरा करेंगे। 100 वर्ष ब्रह्मा की स्थापना का पार्ट है। वह तो 100 वर्ष पूरा होना ही है।मुरली प्रूफ देखें

सन् 1969 में जब ब्रह्मा बाबा ने शरीर छोड़ा तब उनकी 100 वर्ष आयु पूरी नहीं हुई थी। इसलिए उनको आकार शरीर धारण करना पड़ा। ब्रह्मा की 100 वर्ष आयु की गणना तब से होती है जब से शिवबाबा की उनमें प्रवेशता साबित होती है। कराची से लेकर मुरली निकलती आई हैऐसा मु.ता.26.5.78 पृ.1 के मध्यांत में बोला है। मुरली प्रूफ देखें

जब से कराची से मुरली निकली तब से ब्रह्मा में प्रवेशता साबित होती है। उससे पहले बाबा कोई और बच्चों में (प्रवेश करके) मुरली चलाते थे। मुरलियों और अव्यक्त वाणियों के महावाक्यों से यह बात सिद्ध होती है कि सन् 1936/37 में दादा लेखराज में शिवबाबा की प्रवेशता नहीं हुई। यह बात प्रजापिता ब्रह्मा के ऊपर लागू होती है; क्योंकि सन् 1936/37 में रुहानी बाप शिव ने पहले-2 उनमें प्रवेश किया। तब प्रजापिता ब्रह्मा की आयु 60 वर्ष की होनी चाहिए और 60 वर्ष में 40 वर्ष और एड करने से 100 वर्ष पूरे होते हैं। जो आदि ब्रह्मा की (100 साल) आयु 76 में पूरी हो जाती है। जब आदि ब्रह्मा की सोल का मृत्युलोक पूरा होगा तो कौन-सा लोक शुरू होगा ? ज़रूर अमरलोक शुरू होगा। अमरलोक बिना अमरनाथ के तो शुरू हो नहीं सकता। अमरनाथ वो जो कोई भी ज्ञान में उसको मार न सके। जैसे ब्राह्मणों के लिए कहा जाता है ज्ञान में जब तक चल रहे हैं तो जैसे जीवित हैं, जिंदा हैं और जब अनिश्‍चय हो गया तो जैसे मर गये। अमरनाथ की स्टेज ऐसी होनी चाहिए कि वो कभी जन्म-मरण की स्टेज में न आये। वह अमरनाथ का पार्ट हुआ। ड्रामा पर अटूट निश्चय हो जाना, अपने पार्ट पर अटूट निश्चय हो जाना। जैसेकि भविष्य का स्वरूप सामने खड़ा हुआ है। कोई उनको उस निश्चय से, उस लक्ष्य से डिगा नहीं सकता। अमरनाथ माने कोई ज्ञान में उन्हें मार नहीं सकता अर्थात् अपने निश्चय पर ध्रुव तारे की तरह अटल। अ.वा.20.5.74 पृ.44 के अंत में बाबा ने कहा है- एक ही सितारा है जो अपनी जगह बदली नहीं करता। क्या ऐसे सितारे हो? वह है दृढ़ संकल्प वाला सितारा, जिसको अपनी इस दुनिया में ध्रुव सितारा कहा जाता है।मुरली प्रूफ देखें इस तरह सन् 76 से वह रामवाली आत्मा ब्राह्मणों की एडवांस पार्टी की दुनियां में विश्‍वनाथ शंकर के नाम-रूप से प्रत्यक्ष हो जाती है। वो आत्मा मन-बुद्धि की स्टेज से, प्रत्यक्षता रूपी दिव्य जन्म लेने के हिसाब से और अपने पार्ट के प्रत्यक्ष होने के हिसाब से 76 में नया अलौकिक जन्म धारण कर लेती है। संगमयुग कोई बड़ा नहीं है, 50 वर्ष का है। (मु.20.2.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें

इतना 50 वर्ष कोई भी यज्ञ नहीं चलता।... तुम्हारा यह यज्ञ 50 वर्ष चलता है। (मु.11.5.73 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें संगमयुग की आयु जो 50 साल बतायी गयी है वो त्रेतायुगी शूटिंग के हिसाब से (बताई गई है) अर्थात् जो चंद्रवंशी आत्माएँ हैं वो 50 साल की आयु पूरी होने तक ज्ञान में आएँगी। 60 साल द्वापरयुगी शूटिंग के हिसाब से (बताया गया है) अर्थात् 60 साल पूरे होने तक कन्वर्टेड इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन्स की आत्माएँ ज्ञान में आती रहती हैं और

50 वर्ष नहीं तो करके 100 वर्ष लगते हैं। उत्थ(ल)-पाथल पूरी हो फिर राज्य शुरू हो जाते हैं। (मु.25.9.71 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें

अभी है संगमयुग। इसको 100 वर्ष देना चाहिए। (मु.ता.3.11.76 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें

100 साल (के लिए) बाबा ने मुरली में बोला है- बहुत में बहुत करके 100 साल संगमयुग को दो। माना 100 साल टोटल शूटिंग के हिसाब से है जिसमें संपन्न आत्माओं की प्रत्यक्षता भी शामिल है। (जैसे कहीं-कहीं मुरलियों में बाबा ने ये भी कहा है) तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में 40-50 वर्ष लगते हैं। (मु.ता.6.10.74 पृ.2. अंत) मुरली प्रूफ देखें

(ये संगमयुग की आयु से संबंधित नहीं है; लेकिन बच्चों का तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने का पीरियड है। जो बाबा ने बताया कि तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने की शुरुआत कब से होती है? बाप की पूरी पहचान होगी, बाप को पहचान करके याद करेंगे तभी तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बनेंगे। पहचान करके याद करने की जो बात आती है वो सन 76 से आती है। 76 से जब से बाप की पहचान होना शुरू हुई अर्थात् बाप का प्रत्यक्षता वर्ष मनाया गया तो पूरी रीति प्रत्यक्ष होने में एक साल लग जाता है; इसलिए सन 77 को संपूर्णता वर्ष मनाया गया। सन 77 के बाद 40 वर्ष एड किये तो कौन-सा वर्ष आता है? 2017/2018। कोई न कोई आत्माओं का ऐसा ग्रुप है, कोई न कोई ऐसी पारिवारिक इकाई है जो 2018 में तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाती है। उसके बाद फिर नंबरवार तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने वालों की लिस्ट शुरू होती है। 8 के बाद होंगे 100,100 के बाद होंगे 1,000, 1,000 के बाद होंगे 16,000 और 16,000 के बाद होंगे 1,00,000 जो रूद्र यज्ञ में शालिग्राम बनाये जाते हैं और बाद में 4,50,000 जो सतयुगी बच्चों को जन्म देने वाले हैं। उनके साथ-साथ जो जन्म लेने वाली आत्माएँ हैं वो भी प्रवेश होने के कारण संग का रंग लेती हैं तो साथ साथ तमोप्रधान से सतोप्रधान बनती हैं। टोटल कितने हुए? 9,00,000। तो 9,00,000 धरती के चैतन्य सितारें हैं जो 2028 से सारे संसार के बीच चमकने लगेंगे।

फिर बोला - थोड़ा समय 50/60 वर्ष लगते हैं पूरी राजधानी स्थापना में। (मु.ता.24.7.72 पृ.2 आ) मुरली प्रूफ देखें

60 साल में पूरी राजधानी स्थापन होती है। जब राजयोग की पढ़ाई शुरू होगी तभी तो राजधानी स्थापन होगी। बाप ने जो राजयोग सिखाया उसकी शुरुआत कब से हुई? 1976/77 से। तब से 60 साल यानी 2036/37 तक राजधानी स्थापना का कार्य पूर्ण होता है।

इसके बाद जो 4 युग हैं तो वो जैसे ड्रामा के 4 सीन हैं और प्रत्येक युग की शूटिंग का समय भी संगमयुग में नूँधा हुआ होना चाहिए। ऐसे नहीं चारों युगों की शूटिंग एक साथ हो जाएगी। ज़रूर पहले सतयुग की शूटिंग होगी। जैसे कोई मकान बनाते हैं तो पहली मंजिल बनाने में, साज-सामान इकट्ठा करने में टाइम ज्यादा लग जाता है। ऐसे ही पहला युग है सतयुग, उसका फाउंडेशन डालने के लिये भी लम्बा समय चाहिए। शास्त्रों में भी सतयुग की आयु कलियुग से 4 गुनी, त्रेतायुग की 3 गुनी, द्वापरयुग की कलियुग से 2 गुनी दिखायी गई है। ऐसे तो शास्त्रों में 1250 वर्ष का ही कलियुग बताया गया है; लेकिन शास्त्रकारों ने उसे दिव्य वर्षों से गुणा करके लाखों वर्ष का बना दिया। जैसे बाबा कहते हैं - देवताओं का कोई अलग दिन नहीं होता है, न कोई अलग वर्ष होता है, न कोई अलग मास होता है। दिन, वर्ष, मास तो यहीं होते हैं। सतयुग की शूटिंग के लिए अगर उसमें आरम्भ का ध्यान, दीदार की भरमार वाला 10/12 वर्षीय भक्तिमार्ग भी शामिल कर लिया जाए तो सामान्य तौर पर कुल 40 वर्ष का सतयुगी शूटिंग काल हुआ; लेकिन शुरुआत का अगर संगम का समय निकाल दिया जाए और संगमयुगी स्वर्ग की स्थापना का जो सैम्पल कराची में दिखाया गया है उसे लेकर सन् 1960 तक भी ईश्वरीय सेवा की दृष्टि से कोई विशेष वृद्धि नहीं हो पाई।

जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से एक्यूरेट सतयुग की शूटिंग तो 1960/61 से शुरू होती है, उसके पहले 1936/37 से 1946/47 तक संगम में संगम की शूटिंग होती है। उस समय सिंध-हैदराबाद में सतसंग शुरू हुआ था तब सारे हैदराबाद में लहर फैल गई थी कि जो सतसंग में जाता है उसको साक्षात्कार होने लगते हैं। अमेरिका के अख़बार में भी पड़़ गया कि एक कलकत्ते का जवाहरी कहता है मुझे 16,108 रानियाँ चाहिए, अभी 400 मिली हैं। (मु.31.8.78 पृ.3 आ.) मुरली प्रूफ देखें

उस समय सिंध-हैदराबाद की आबादी लगभग 9 लाख थी; इससे स्पष्ट होता है कि 9 लाख जनसंख्या को संदेश मिल जाता है। फिर बाद में सतसंग चलते-चलते विघटन की प्रक्रिया भी शुरू हुई। सिन्ध-हैदराबाद के जिन लोगों ने संदेश दिया था, सतसंग के ऊपर श्रद्धा-विश्वास पैदा किया था उनका एक संगठन ओममण्डली और दूसरा एण्टी ओममण्डली ऐसे दो संगठन के रूप में द्वैतवाद आ जाता है। तो जनसंख्या घटी या बढ़ी? कहेंगे कि न घटी और न बढ़ी। फिर जब हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ

और द्वैतवाद आने के कारण जो आत्माएँ जेल में डाल दी गई थीं, तालों में बन्द कर दी गई थीं, उनको अचानक छुटकारा मिल गया और फिर वो आत्माएँ कराची में इकट्ठी हो गईं।

हंगामा जब होगा तो साकार शरीर द्वारा तो कुछ कर न सकेंगे और प्रभाव भी इस सर्विस से (मनसा सेवा से) पड़ेगा। जैसे शुरू में भी साक्षात्कार से ही प्रभाव हुआ ना, परोक्ष-अपरोक्ष अनुभव ने प्रभाव डाला, वैसे अंत में भी यही सर्विस होनी है। (अ.वा.24.1.72 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें

बहुत हैं जो टूट जावेंगे। थोड़ी आफतें आने दो, फिर देखना कैसे भागते हैं! तुम भागे हो ज्ञान के पिछाड़ी। ज्ञान न होता तो भागते थोड़े ही। तुम इनके पिछाड़ी थोड़े ही भागते हो। इसने जादू आदि कुछ नहीं किया। जादूगर शिवबाबा को कहते हैं। (मु.5.11.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें

हमने कोई को भगाया क्या? किसको भी कहा नहीं कि तुम भागकर आओ। हम तो वहाँ थे। यह आपे ही भाग आईं।... कोई मनुष्य यह सब थोड़े ही कर सकता। सो भी ब्रिटिश गवर्मेंट के राज्य में। कोई के पास में इतनी कन्यायें-मातायें बैठ जायें। कोई कुछ कर न सके। कोई सम्बंधी आते थे तो एकदम भगा देते थे। बाबा तो कहते थे भल इनको समझाओ, ले जाओ। मैं कोई मना थोड़े ही करता हूँ; परंतु किसकी हिम्मत नहीं होती थी। बाप की ताकत थी ना। नथिंग न्यू। यह फिर भी सब होगा। (मु.22.4.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें जो आत्माएँ कराची में इकट्ठी हो गईं उनके लिए ब्राह्मणों का एक परिवार तैयार हो गया। उस एक परिवार में ऐसे रहते थे, जैसे वसुधैव कुटुम्बकम्, पुरानी दुनिया भूल गई। वहाँ से फिर डुप्लिकेट स्वर्ग की शुरुआत हुई। जिसकी यादगार अजमेर में आज भी दिखाई गई है। स्वर्ग का मॉडल अजमेर में बनाया हुआ है। तो कराची में जो पीरियड था वो एकदम शुद्ध, सतोप्रधान पहले जन्म का सैम्पल था। सतोप्रधान शूटिंग वहाँ हुई; क्योंकि एक साकार बाप का संग था। किसी तमोप्रधान मनुष्य का चेहरा भी देखने को नहीं मिलता था तो दिल किससे लगावेंगे? मुरली में बाबा ने पूछा- कोई को देखते ही नहीं थे तो फिर दिल किससे लगावेंगे? (सिवाय सत् बाप के)। (मु.ता.8.7.74 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें तो अवस्था कैसी बनेगी, व्यभिचारी या अव्यभिचारी? सतोप्रधान बनेगी ना! इस प्रकार वहाँ कराची की शूटिंग पीरियड में सतोप्रधान अव्यभिचारी स्टेज रहती है। उस समय सन् 47 में हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बड़ा भारी झगड़ा हुआ था। ट्रेनें की ट्रेनें काट डाली गयी थीं और खून की नदियाँ बह गयी थी और सन् 47 के बाद 3/4 साल तक भी ये 300/400 कन्याएँ, माताएँ, भाई लोग वहाँ कराची में रहे। उसके बाद कराची से ये सारा संगठन उखड़ करके सन् 50/51 में माउण्ट आबू आये थे। वहाँ भी 3/4 साल टिके रहे और माउण्ट आबू में इन्होंने बड़ा मकान ले करके सतसंग शुरू कर दिया। पहले दो-तीन साल वही जंगल में, पहाड़ों में उस मकान में रहे। बाद में बच्चों की थोड़ी परीक्षा ली गयी। तो बाबा ने बच्चों को अचानक ढोढ़ा और छाँछ माना बाजरे की रोटी और छाँछ खिलाना शुरू कर दी।

जैसे स्थापना के आरम्भ में आसक्ति है वा नहीं, उसकी ट्रायल के लिए बीच-2 में जानबूझकर प्रोग्राम रखते रहे। जैसे, 15 दिन सिर्फ ढोढ़ा और छाछ खिलाई, गेहूँ होते भी यह ट्रायल कराई गई। कैसे भी बीमार 15 दिन इसी भोजन पर चले। कोई भी बीमार नहीं हुआ। दमा की तक़लीफ़ वाले भी ठीक हो गये ना। (अ.वा.25.10.87 पृ.103 अंत) मुरली प्रूफ देखें

ऐसे नहीं कि तन-मन-धन दे दिए हैं तो कोई भूख मरते हैं। नहीं। शिवबाबा का भण्डारा है, जिससे सभी का शरीर निर्वाह होता है, होता रहेगा। भल कहानियाँ हैं द्रौपदी के डेंगरे की खुर-2 हुई, फिर भी विजय तो हुई ना। अभी प्रैक्टिकल में पार्ट चल रहा है। शिवबाबा का भण्डारा सदैव भरपूर है। वह भी एक परीक्षा थी, जिनको डर हुआ तो समझा जाकर अपने माँ-बाप पास सुखी हो जावें तो चले गए। बाकी साथ देने वाले चले आये हैं । भूख मरने की तो बात ही नहीं। (मु.ता.6.3.77 पृ.2 मध्‍यांत) मुरली प्रूफ देखें

बच्चों ने समझा कि बाबा लखपति थे, उनके पास जो जवाहरात का पैसा था (वो सारा पैसा) 300/400 की बारात को इतने सालों से परवरिश करते-(करते) खलास हो गया। अब बाबा के पास कुछ नहीं रहा। ऐसे समझकर बच्चे कुलबुलाने लगे, परेशान होने लगे। जिन अनिश्चय बुद्धि बच्चों को अनिश्चय पैदा होने लगा, अंदर से परेशान होने लगे तो उन बच्चों को बाबा ने कहा कि तुम्हारे जो सिंध हैदराबाद के सम्बन्धी हैं, जो भारतवर्ष में सिंधी कालोनीयाँ बना कर बस गये थे, उन सिंधियों को, अपने परिवार वालों को जा करके जगाओ। उनको जा करके ये ज्ञान सुनाओ, जो ब्रह्मा मुख से तुमको सुनाया जा रहा है। अ.वा.10.11.83 पृ.16 में भी यह जो पेपर लिया गया इसके लिए बताया कि जब पहले-पहले मित्र-संबंधियों के पास गये तो क्या पेपर था, वह शरीर को न देखें लाइट देखें। बेटी न देखे; लेकिन देवी देखें। यह पेपर दिया ना! अगर संबंध के रूप से देखा, बेटी-बेटी कहा तो फेल। तो ऐसा अभ्यास चाहिए।मुरली प्रूफ देखें

तो जो अनिश्चय बुद्धि थे वो तो बड़ी जल्दी जाने के लिए तैयार हो गये। 300/400 में से 70/75 बचे और बाकी सब ऑल इंडिया में अलग-अलग शहरों में जो सिंधी लोग आये थे, वहाँ वो अपने-अपने घर-परिवार में चले गये। 70/75 जो बचे, उनको ले कर ये यज्ञ चलता रहा। बाबा ने देखा कि अब ये निश्चयबुद्धि बच्चे हैं तो उनके लिए उन्होंने सेवा का ठिकाना बनाया और सबसे पहले दिल्ली के कमलानगर सेंटर पर किराए का एक मकान ले करके आश्रम शुरू कर दिया। पहले-पहले सन् 52/53 में जमुना के कण्ठे पर एक ही आश्रम कमला नगर सेन्टरखुला था और छोटे-छोटे मन्दिरों में जमुना के किनारे जहाँ लोग स्नान करते हैं, वहाँ झोपड़ियों में दीदी-दादियाँ आ करके रहती थीं और स्नान करने वालों की सेवा करती थीं। कोई विश्वास नहीं करता था। उसके बाद कानपुर, जालंधर, चंडीगढ़, बंगलौर, हैदराबाद में अलग-अलग शहरों में आश्रम खुलने लगे। जब सेवा के फील्ड पर बच्चों को उतारा जाता है तब सेवा के फील्ड पर उतरने के कारण बच्चों की अवस्था ज़रूर ऊपर-नीचे होती है। उस समय बाबा ने तो बच्चों को अपनी अवस्था को जमाये रखने के लिए डाइरैक्शन दे दिया था- गो सून, कम सून।(मु.ता.29.9.63 पृ.9 आ.) मुरली प्रूफ देखें

ईश्वरीय सेवा के लिए जल्दी-जल्दी जाओ और जल्दी-जल्दी वापस आओ। तो जिन बच्चों ने उस डाइरैक्शन पर अमल किया वो बच्चे जैसे ही अवस्था थोड़ी खराब होती थी तो बाबा के पास दौड़कर आ जाते थे। उनकी अवस्था बाबा के संग के रंग में आने से बीच-बीच में कवर होती रही और जो बच्चे अनिश्चय बुद्धि हो गए वो पुरानी दुनिया में भ्रमित होकर रह गए। उनकी अवस्था दिन-प्रतिदिन डाउन होती चली गई। तो उन दस-बारह वर्षों में, 47 से लेकर 60 तक प्रचार-प्रसार की सामग्री न होने के कारण ब्राह्मणों की जनसंख्या अत्यंत धीमी गति से बढ़ती रही। श्रद्धा-विश्वास रखने वाली प्रजा वर्ग की जो 4.5 लाख आत्माएँ थीं, वो संख्या बढ़ते-बढ़ते 9 लाख तक हो गई। इससे ज्यादा तो मानने वाले हुए ही नहीं और पुरुषार्थ करने वाले तो बहुत ही थोड़े थे।

हर एक मनुष्य मात्र को, हर चीज़ को सतो, रजो, तमो में आना होता है। नई से पुरानी ज़रूर होती है। कपड़ा भी नया पहनते हैं फिर पुराना होता तो कहेंगे न- पहले सतोप्रधान, फिर ज़रूर सतो, रजो, तमो तुमको ज्ञान मिला है। (मु.13.6.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें

हर चीज़ पहले सतोप्रधान, फिर सतो, रजो, तमो होती है। (मु.ता. 5.9.85 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें

हर युग अपने शूटिंग काल में 4 अवस्थाओं से गुजरता है। 4 अवस्थाओं से गुजरना माना सतोप्रधान, सतोसामान्य, रजोप्रधान और तमोप्रधान माना एक कल्प की आवृत्ति एक युग की शूटिंग में नूँधी हुई है। 1960/61 में त्रिमूर्ति, गोला और झाड़ ये चित्र बने। उस समय सबसे पहले सच्ची गीता नाम के बड़े-से वॉल्यूम की 500 प्रतियाँ ही छपाई गई थीं। उसमें ये तीनों चित्र छापे गए। बाद में गवर्मेन्ट के द्वारा बैन (बंद) करने के बाद छपाना बन्द कर दिया। इसके बाद ब्रह्मा बाबा ने हज़ारों की तादाद में फोल्डर्स छपाये थे। उन फोल्डर्स के आधार पर सेवा तीव्र गति को पाई। इस प्रकार सन् 60/61 से तेजी से सन्देश देने का कार्य शुरू हुआ। उस समय से ब्राह्मणों की जनसंख्या में वृद्धि होना शुरू होती है और 61 से लेकर 76 तक सर्विस खूब वृद्धि को पाती रही।

मम्मा-बाबा जब तक जीवित रहे तब तक सन्देश देने का कार्य तो हुआ; लेकिन उतनी तीव्र गति से नहीं हुआ। जैसे- सतयुग-त्रेता में जनसंख्या विस्फोट नहीं होता। थोड़ी-2 आत्माएँ ऊपर से नीचे चैतन्यता में आती रहती हैं। ऐसे ही यहाँ शूटिंग पीरियड में आत्माएँ ज्ञान का सन्देश लेने की चैतन्यता में आती रहती हैं। उस समय के बाद ज्ञान की दुनिया में आत्माओं की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी और सतयुगी शूटिंग तेज हो गयी। पहले मम्मा ज्ञान यज्ञ की कंट्रोलर, शासनकर्ता थी तो यथा राजा तथा प्रजाकी भी सन् 60/61 से लेकर सन् 64 तक सतोप्रधान अवस्था की शूटिंग चलती है।

उसके बाद 24 जून 1965 में मम्मा ने शरीर छोड़ दिया। तब यज्ञ की कंट्रोलर मम्मा तो नहीं रही, उनका स्थान किसी और धर्म में कन्वर्ट होने वाली आत्मा ने लिया जिसके कारण अवस्था सतोप्रधान नहीं रही, सतोसामान्य बन गयी। बाबा ने मुरली में ये भी बोला है कि बाबा भल चला जाए; लेकिन मम्मा अंत तक यज्ञ में रहेगी। तो जो बच्चे मम्मा के आधार पर चलने वाले थे, उनको बाबा के महावाक्यों के ऊपर से निश्चय उखड़ गया और वो बच्चे अनिश्चयबुद्धि हो गये।

उस समय जो बच्चे बाबा के पास बीच-बीच में आते रहे, लगातार दुनियावी संग न होने के कारण उन बच्चों की सतोसामान्य स्टेज बनी रही। उस समय गिरती कला की शूटिंग नहीं कहेंगे। जैसे त्रेतायुग में कलाओं का परिवर्तन होता है, कलाएँ नीचे तो गिरती हैं; लेकिन दुःख की शुरुआत नहीं होती। तो ऐसे ही हुआ। ब्राह्मणों की दुनिया में सतोसामान्य स्टेज बनी रही। ब्रह्मा बाबा में तो परमात्मा शिव की सोल, गॉड फादर की सोल थी ही। तो जैसा संग वैसा रंगरहा। जिन बच्चों ने साकार में संग लिया उस समय तक सतोसामान्य स्टेज रही, त्रेतायुगी शूटिंग हुई। इस तरह सन् 65 से 68 तक सतयुग की शूटिंग में सतोसामान्य अवस्था की शूटिंग चलती है।

उसके बाद 18 जनवरी 1969 को जब बाबा ने शरीर छोड़ दिया तो साकार संग समाप्त हो गया और उन अधूरे ब्राह्मणों का जब परमात्मा का साकार संग समाप्त हुआ और तमोप्रधान दुनिया वालों का संग रह गया तो द्वापरयुगी रजोप्रधान अवस्था बन गई। मम्मा-बाबा के शरीर छोड़ने के बाद फिर द्वैतवाद शुरू हो गया। द्वैतवाद की निशानी क्या है? धर्मसत्ता-राज्यसत्ता अलग-अलग हाथों में आ गई। ब्राह्मणों की दुनिया में ऐसा ही हुआ। पहले सारा यज्ञ का कंट्रोल माउंट आबू से होता था। मम्मा-बाबा के शरीर छोड़ने के बाद जोनल इन्चार्जस बनाए गए और उनके हाथों में उन-उन जोन्स की कंट्रोलिंग पावर सौंप दी गई। तो धर्मसत्ता-राज्यसत्ता अलग-अलग हाथों में बँट गयी। इस तरह सतयुग की शूटिंग में सन् 69 से रजोप्रधान द्वापरयुग की शूटिंग शुरू हो गयी। द्वापर जब शुरू होता है तो विदेशों में तेजी से जनसंख्या बढ़ती है। यज्ञ में भी ऐसे ही हुआ। बाबा के शरीर छोड़ने के बाद लंडन का पहला सेवाकेन्द्र 69 में खुला, जो सब विदेशों का हेड ऑफिस बन गया; क्योंकि द्वापरयुगी रजोप्रधान स्टेज से ही बाहरी दुनिया की आबादी भी तीव्र गति से बढ़ती है, दूसरे-दूसरे धर्म की आत्माएँ सत्ता में आने लग पड़ती हैं। ब्राह्मणों के यज्ञ में भी ऐसे ही हुआ। यह क्रम 73 तक चलता रहा। 69 से लेकर 72 तक जैसे द्वापरयुगी शूटिंग होती रही और 73 के बाद पतन का एक बड़ा मानवीय उपक्रम फिर से शुरू हो गया और पतन का घर बन गया। बाबा ने कहा है-

मेले-मलाखड़े सब दुर्गति में ले जाने वाले हैं। बाप तो बच्चों को समझावेंगे ना। (मु.25.11.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें

उन मेलों पर तो मनुष्य मैले जाकर होते हैं। पैसे बरबाद करते रहते हैं। मिलता तो कुछ भी नहीं। (मु.ता. 14.5.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें

73 में परमात्मा तो प्रैक्टिकल में था नहीं। सन् 73 में रामलीला ग्राउंड में पहला मेला हुआ और उसके बाद हर बड़े-2 शहर में बड़े-2 मेलों का आयोजन होने लगा। तो सन् 73/74 से आत्माओं के जो मेले हुए उनमें ढेर-की-ढेर तमोप्रधान मनुष्य आत्माओं ने प्रवेश करना और ब्रह्माकुमार-कुमारियों के संसर्ग-सम्पर्क में आना शुरू कर दिया। एक-एक मेले में लाखों आत्माओं को एक साथ संदेश दिया जाने लगा और हर महीने भारत के किसी न किसी बड़े शहर में वो मेलों का आयोजन होने लगा। जब लाखों की तादाद में करप्टेड दृष्टि-वृत्ति वाले हुजूम के हुजूम लोग ब्रह्माकुमार-कुमारियों के संसर्ग-सम्पर्क और दृष्टि के बीच आने लगे तो अवस्था कैसी बनेगी? ज्ञान-योग की शक्तियाँ कहाँ तक कवर करेंगी? तमोप्रधान स्टेज बन गयी। इसलिए बाबा कहते हैं- जैसा संग वैसा रंग, संग दोष और अन्न दोष-ये बहुत बड़े दोष हैं।इस प्रकार 73 से लेकर 76 तक ब्राह्मणों की दुनिया में तमोप्रधान कलियुग की स्थापना हो गयी। 73 की जो ज्ञानअमृतमैगजीन छपी है उसमें तब तक की पूरी सर्विस का पोतामेल दिया गया है। जिसमें बताया गया है कि अब तक विश्व की 1 करोड़ आत्माओं को संदेश दिया जा चुका है। तो जैसे 500 करोड़ में से एक करोड़ विश्व की अंश मात्र आत्माएँ हो गईं। तो हिसाब ठीक था। सन् 73/74 से लेकर 76 तक और 100 लाख अर्थात् 1 करोड़ आत्माओं को संदेश मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी। इस तरह सतयुग की 2 करोड़ मनुष्य आत्माओं को 76 तक ज्ञान का संदेश मिलने का ड्रामा की नूँध अथवा शूटिंग का कार्य पूरा हो जाता है। मु.ता.22.3.76 पृ.1 अंत की मुरली में बोला है सतयुग अंत में वृद्धि होकर 9 लाख से 2 करोड़ हो गए होंगे। मुरली प्रूफ देखें

इस प्रकार सतयुगी दैवी शूटिंग के अंदर ही ये 4 अवस्थायें प्रसार हो गईं, जैसेकि एक कल्प की आवृत्ति हो गई। 5000 वर्ष में जिस तरह ड्रामा हूबहू रिपीट होता है, वैसे ही हूबहू रिपीटेशन इन 40 वर्षों में होता है।

सन् 61 से लेकर 76 तक के 16 वर्षों में संदेश देने की सेवा के हिसाब से अथवा संदेश लेने की सेवा के हिसाब से ज्ञान यज्ञ में आत्माओं की वृद्धि शुरू हुई। तो 61 से लेकर 76 तक का पीरियड सेवा के क्षेत्र में तीव्रगति लाने का है। उसमें सतयुगी शूटिंग करने वाली जितनी भी आत्माएँ थीं, जिनकी संख्या बाबा ने सतयुग के आदि में 9 लाख और सतयुग के अंत में 2 करोड़ बतायी है, वो ज्ञान का संदेश ले लेती हैं।

चित्र में सतयुगी शूटिंग काल में मुखिया कौन दिखाये गये हैं? प्रतिनिधित्व करने वाली आत्माएँ कौन-सी दिखायी गयी है? राधा-कृष्ण की आत्माएँ। हम जानते हैं यह सतयुगी शूटिंग का वही पीरियड है जिसमें राधा-कृष्ण की आत्माएँ अर्थात् मम्मा-बाबा या ब्रह्मा-सरस्वती की आत्माएँ, ब्राह्मण बच्चों के दिलोदिमाग में स्थायी होकर रहती हैं, हीरो-हीरोइन के रूप में पार्ट बजाती हैं। इसलिए वो सतयुगी शूटिंग के निमित्त हो गए।

40 वर्ष पहले जो-जो कार्य कलाप यज्ञ के अंदर हुए थे वही क्रियाकलाप 40 वर्षों के बाद फिर 76 से लेकर 89 तक भी चलते रहते हैं, यानी त्रेतायुगी शूटिंग भी 4 अवस्थाओं से पसार होती है। दिल्ली से एडवांस पार्टी की शुरुआत होती है; क्योंकि एडवान्स पार्टी की बीजरूप आत्माओं का विशेष कार्य है राजधानी की स्थापना करना। ब्रह्मा और ब्राह्मणों के द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना और एडवांस पार्टी की बीजरूप (राजा बनने वाली) आत्माओं के द्वारा राजधानी (स्वर्गीय संगठन) के संगठन की स्थापना की शुरुआत सन् 76 से हो जाती है। भल थोड़ी आत्माओं के द्वारा यह संगठन शुरू हुआ। जैसा बाबा ने बोला एक भी पावरफुल संगठन होने से एक-दूसरे को खींचते हुए 108 की माला का संगठन एक हो जावेगा। एक-मत का धागा हो और संस्कारों की समीपता हो तब ही माला भी शोभेगी। दाना अलग होगा या धागा अलग-अलग होगा तो माला शोभेगी नहीं।(अ.वा.9.12.75 पृ.272 मध्य) मुरली प्रूफ देखें

 

तो पहले तो चतुर्युगी शूटिंग के बाद प्रजापिता ब्रह्मा जैसी श्रेष्ठ आत्माओं का एक 12 का ग्रुप तैयार होगा ना! सन् 76 को बाप का प्रत्यक्षता वर्ष घोषित किया गया; लेकिन 76 में बाप प्रत्यक्ष नहीं हुआ। एक वर्ष और रूंग में जोड़ा गया। सन् 77 को सम्पूर्णता वर्ष घोषित किया गया। माना जिस युग की भी शूटिंग होती है, उस शूटिंग की चार अवस्थाओं की शूटिंग होने के पश्चात् जो भी टाइम है, उसमें एक वर्ष रुंग का जोड़ा जाता है। मु.ता. 16.1.79 में बाबा ने कहा है कि - इस एक्स्ट्रा समय का भी रहस्य है। पीछे आने वाले उलाहना न दें कि हमें बहुत थोड़ा समय मिला। जैसे सौदे के पीछे एक्स्ट्रा रूंग(घात) दी जाती है- वैसे ड्रामा अनुसार यह समय भी सेवा के प्रति अमानत रूप में मिला हुआ है। मुरली प्रूफ देखें

चाहे सतयुगी शूटिंग हो, त्रेतायुगी शूटिंग हो, द्वापर की हो या कलियुगी हो। जैसे 50 रूपया किसी को दान में देते हैं, तो 50 के साथ एक रूपया और एड किया जाता है। जैसे 100 रूपये देते हैं तो 100 के साथ एक रुपया और एड किया जाता है। तो ऐसे ही पुरुषार्थ में पुरुषार्थी ब्राह्मण बच्चों के लिए पहले से नहीं बताया जाता है; लेकिन जब टाइम पूरा होता है तो उसी टाइम एक वर्ष की रुंग और बढ़ा दी जाती है। जैसे मार्केट में सब्जी लेने जाते हैं तो खरीददार सब्जी लेता है। दुकानदार देता है। महँगाई बढ़ती जाती है तो खरीददार संतुष्ट नहीं होता तो दुकानदार क्या करता है? अच्छा, ये थोड़ा-सा और ले जाओ। तो धनिया, मिर्चा कुछ न कुछ और दे देगा। तो ऐसे ही बापदादा पुरुषार्थ के समय की रुंग दे देता है। अच्छा, समय के अनुसार तुम्हारा पुरुषार्थ पूरा नहीं हुआ तो एक वर्ष रुंग का और बढ़ा दिया; क्योंकि प्रत्यक्षता के लिए साकार दुनिया में कुछ तो माध्यम चाहिए। एडवांस पार्टी की शुरुआत में सन् 77 का अंत होते-2 सच्ची गीता सार पुस्तकें छापी गई जो बाद में देहधारी धर्म-गुरुओं के द्वारा चुरा ली गईं और उसकी प्रतियाँ जला दी गईं। थोड़ी बहुत जो बचीं, वो बाँट दी गईं। सच्ची गीता सार पुस्तक छपने तक और ब्राह्मणों के हाथों में पहुँचने तक ब्राह्मणों की दुनिया में बाप की प्रत्यक्षता आख़रीन हो ही गई। वो बीज पड़ गया। प्रत्यक्षता की शुरुआत हो गई। पूरी तरह प्रत्यक्षता नहीं हुई; क्योंकि और युगों की शूटिंग भी तो बाक़ी थी। ऐसे तो बाप की प्रत्यक्षता में 500 करोड़ मनुष्य आत्माओं का योगदान है। सारी ह्यूमिनिटी का बाप है। सर्व आत्माओं का पिता उसमें मौजूद है। इसलिए जो भी मनुष्य आत्माएँ हैं; चाहे वो नास्तिक धर्म की ही क्यों न हों, वो सभी जब तक उस बाप को पहचान नहीं लेती तब तक नहीं कहेंगे कि बाप की प्रत्यक्षता पूरी हुई। पहले तो बात है ब्राह्मणों की दुनिया में बाप की प्रत्यक्षता। जो भी ब्राह्मण बनते जाते हैं; चाहे वो बेसिक नालेज के हों, एडवांस नालेज के हों, उनकी बुद्धि में वो चैतन्य बाप जो प्रैक्टिकल में स्वर्ग की स्थापना के कार्य में लगा हुआ है, उसकी पहचान आनी चाहिए। तो उसकी शुरुआत 76 से होती है। किसके द्वारा? यही वो चार विशेष आत्माएँ हैं जो गीता में मुखपृष्ठ पर दिखायी जाती हैं। चार मन, बुद्धि रूपी घोड़े हैं जिनकी बुद्धि की लगाम सुप्रीम सोल बाप भगवान के हाथ में होती है। वे चार धर्मों की चार विशेष आत्माएँ प्रत्यक्ष होकर बाप को ब्राह्मणों की दुनियाँ में प्रत्यक्ष कर देती हैं। जो चार मुख्य धर्म हैं- देवता धर्म, इस्लाम धर्म, बौद्धी धर्म और क्रिश्चियन धर्म, उन चार मुख्य धर्मों के जो स्थूल बीज हैं, उन बीज रूप चार आत्माओं के द्वारा बाप आंशिक रूप से प्रत्यक्ष होता है। उसमें एक पहला बीज तो स्वयं राम बाप वाली आत्मा है। स्वयं स्वयं को प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता; क्योंकि नियम है छुपा रुस्तम बाद में खुले; लेकिन बाक़ी तीन धर्मों के जो तीन बीज हैं, वो उस बाप को पहचान लेते हैं और अपने स्वरूप को भी पहचान लेते हैं। पहचानने के साथ-2, अपनी प्रत्यक्षता के साथ-2 बाप को भी प्रत्यक्ष करते हैं। वे चार धर्मों की चार विशेष आत्माएँ प्रत्यक्ष होकर बाप को ब्राह्मणों की दुनिया में प्रत्यक्ष कर ही देती हैं। अंतर सिर्फ़ यही होता है अर्थात् कमी सिर्फ़ यही होती है कि पहले वो अपने को प्रत्यक्ष करती हैं और साथ में फिर बाप को प्रत्यक्ष करती हैं। ये विदेशीयता आ जाती है। वैसे भी अव्यक्त वाणी में खास बोला है- बाप किसके द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं? बच्चों के द्वारा। कौन-से बच्चों के द्वारा? देशी या विदेशी? विदेशी बाप को प्रत्यक्ष करेंगे; क्योंकि जितने भी विदेशी धर्म हैं वो सब बाद में आये हैं। भावना में तीखे नहीं होते हैं; लेकिन बुद्धि में तीखे होते हैं। ज्ञान बुद्धि का विषय है। ज्ञान से ही बाप की पहचान होती है; इसलिए बुद्धि की तीक्ष्णता के आधार पर विदेशी आत्माएँ बाप को पहले पहचान लेती हैं। सन् 76 में बाप का प्रत्यक्षता वर्ष अव्यक्त वाणी में घोषित हुआ और 77 में ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनियाँ में एडवांस पार्टी के द्वारा बाप ज्ञान सूर्य प्रत्यक्ष होने लगा; लेकिन किसके द्वारा प्रत्यक्ष हुआ? विदेशियों के द्वारा। इसीलिए विदेशियों में दिन की शुरुआत रात के 12 बजे से मानी जाती है। वास्तव में रात्रि के 12 बजे तक सूर्य अस्त होता जाता है। अंधेरा बढ़ता जाता है और रात्रि के 12 बजे सूर्य उदय की ओर आने लगता है; लेकिन उदय होता नहीं है। बुद्धि से पहचाना जा सकता है। विशेष आत्माएँ, जो सप्तर्षि, मुनि, महर्षि, ब्रह्मर्षि हैं, जो शास्त्रों में गायन है वो योगबल के द्वारा पहचान लेते हैं कि ज्ञान सूर्य कब उदय होने वाला है। भले उन ब्रह्मऋषियों के मंदिर बनाकर पूजा नहीं होती है; लेकिन विशेष आत्माएँ हैं। बड़े-2 धर्मपिताएँ जो- इब्राहीम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरु नानक आदि धर्मपिताएँ हुए वे उनके ही आधारमूर्त हैं और उनकी जो बीजरूप आत्माएँ हैं, उनके द्वारा बाप की प्रत्यक्षता की शुरुआत होती है; लेकिन सम्पूर्ण नहीं कहेंगे; क्योंकि और भी तीन युगों की शूटिंग अभी बकाया है। तो 16 वर्षों में सतयुगी शूटिंग की चार अवस्थायें पूरी हुईं। सम्पूर्णता वर्ष सन् 77 पूरा हुआ (अर्थात 76 में) और एक वर्ष रुंग का जुड़ गया।

त्रेतायुगी शूटिंग में एडवांस पार्टी की बीजरूप आत्माओं में भी ये चार अवस्थाएँ होती हैं। सतोप्रधान स्टेज होती है 78 से 80 तक।

सन् 81 से लेकर 83 तक सतोसामान्य स्टेज बनती है। सन् 83 में जगदंबा माँ सरेंडर होती है जो बाबा कहते हैं कि सन् 83 चल रहा है तो तेरा होना चाहिए ना।

मुरलियाँ तो बहुत सुनी हैं। कुछ रहा है सुनने का? अभी तो मिलना और मनाना है। सुनना और सुनाना भी बहुत हो गया। साकार रूप में सुनाया, अव्यक्त रूप में भी कितना सुनाया, एक वर्ष नहीं; लेकिन 13 वर्ष। अभी तेरहवें में तेरा ही होना चाहिए ना। तेरा हूँ इसी धुन में रहो तो सारा सुनाने का सार आ जावेगा। (अ.वा.21.3.81 पृ.80 म.) मुरली प्रूफ देखें

पंजाब की धरनी कन्या दान में श्रेष्ठ निकली अर्थात् महादानी निकली। (अ.वा.19.12.78 पृ.137 मध्य) मुरली प्रूफ देखें

त्रेतायुग की रजोप्रधान अवस्था सन् 84 से सन् 86 तक बनी रही। 84 में 84 घण्टों की देवी के आ जाने से 84 घण्टों का आना शुरू होता है और द्वापरयुगी द्वैतवाद की शुरूआत होती है; इसलिए द्वापरयुगी रजोप्रधान स्टेज है; क्योंकि द्वापरयुग से आने वाले 7 विधर्मी ग्रुप 12X7= 84 घंटों (विधर्मी आत्माओं) की अधिष्ठात्री का प्रादुर्भाव होता है।

84 का साल आ रहा है। 84 घण्टे वाली शक्ति मशहूर है। (अ.वा.10.11.83 पृ.11 आदि) मुरली प्रूफ देखें

87 से 89 तक का ये पीरियड त्रेतायुगी शूटिंग में तमोप्रधानता का नूँधा हुआ है। 87/88 में चोरियाँ-चकारियाँ होने लगीं, विदेशी आत्माएं आने लगीं। विदेशी आत्माओं का आधिपत्य शुरू हो गया। सन् 1986/87 में पचास हज़ार की समूची सम्पत्ति कम्पिल आश्रम से चोरी हो गई। इस तरह त्रेतायुगी शूटिंग में भी चार अवस्थाएँ हो गईं।

त्रेतायुगी सेकेण्ड सीन में मुखिया कौन दिखाए गए? राम-सीता वाली आत्माएँ। तो ज़रूर त्रेतायुगी शूटिंग में प्रतिनिधि के रूप में, मुखिया के रूप में राम-सीता वाली आत्माएँ रंगमंच पर ब्राह्मणों की दुनिया के बीच आनी चाहिए। तो वैसे ही हुआ। राधा-कृष्ण की आत्माएँ अगर ब्राह्मणों की दुनिया स्थापन करने के निमित्त बनती हैं, ब्राह्मणों की नयी दुनिया बनाती हैं, तो यह स्थापना का कार्य सतयुगी शूटिंग में संपन्न हुआ; लेकिन जब तक कचड़े का विनाश न हो तब तक स्थापना का कोई मूल्य नहीं होता। तो ब्राह्मणों की पुरानी दुनिया में दो प्रकार के ब्राह्मण इकट्ठे हो गए। रावण, कुम्भकर्ण जैसे ब्राह्मण भी इकट्ठे हुए, तो वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे पुरुषार्थी ब्राह्मण भी हुए। तो उनमें से श्रेष्ठ वर्ग को एक ओर करने के लिये, शॉर्टिंग करने के लिये और दुष्ट वर्ग का सफाया करने के लिये शंकर का पार्ट शुरू हो जाता है। जैसे कृष्ण की सोल त्रिमूर्ति चित्र में ब्रह्मा का पार्ट बजाती है, वैसे ही राम की आत्मा त्रिमूर्ति में शंकर का पार्ट धारण करती है।

इस प्रकार त्रेतायुगी शूटिंग जो 76 से शुरू होती है, उसका हिसाब यही है कि 76 से 10 साल पहले सन् 66 में बाबा ने मुरली में जो घोषणा कराई थी कि 10 वर्ष में पुरानी दुनिया का विनाश(अर्थात् ब्राह्मणों की पुरानी दुनिया का विनाश होता है।) किसके द्वारा? शंकर के द्वारा। जिसके द्वारा विनाश होता है, वो विनाश के निमित्त बनी हुई आत्मा कोई- न- कोई होनी चाहिए। तो वो है राम वाली सोल। वही आत्मा ब्रह्मा के शरीर छोड़ने के बाद 69 में यज्ञ में आ जाती है। वो 76 तक अपना पुरुषार्थ परिपक्व स्टेज में पहुँचा देती है और 76 में प्रत्यक्ष हो जाती है। जैसे ब्राह्मणों की दुनिया में ब्रह्मा-सरस्वती प्रतिनिधि के रूप में थे, वैसे ही ब्राह्मणों की नयी दुनिया अर्थात् एडवांस पार्टी की दुनिया में ब्राह्मण बच्चों के बीच वो राम-सीता वाली आत्माएँ शंकर-पार्वती के रूप में प्रत्यक्ष होने वाली आत्माएँ त्रेतायुगी शूटिंग के प्रतिनिधि के रूप में पार्ट बजाती हैं। इसलिए एडवांस बच्चों के दिल और दिमाग में वो बच्चे विशेष छाये हुए रहते हैं, जैसे ब्रह्मा-सरस्वती सन् 46 से 76 तक ब्राह्मण बच्चों के दिल और दिमाग पर छाये रहे। तो त्रेतायुगी शूटिंग में राम-सीता वाली आत्माएँ भी 30 साल तक (विशेष) निमित्त बनती हैं। 76 से लेकर 89 तक का 12 वर्ष का इनका कार्यकाल त्रेतायुगी शूटिंग कराने के लिए विशेष निमित्त नूँधा हुआ है। यहाँ भी हिसाब वही संदेश देने का है; क्योंकि त्रेता अंत की आबादी बाबा ने 5-10 करोड़ बतायी है। त्रेता के अंत तक 33 करोड़ आबादी नहीं होती है, अगर त्रेता अंत में 33 करोड़ आबादी हो जाये, 12 जन्मों में 2 करोड़ से बढ़कर 33 करोड़ हो जाये, 16 गुनी बढ़ जाये, तो द्वापर के अंत में तो और ही कई ज्यादा गुनी बढ़ेगी ना! फिर इस तरह कलियुग के अंत में कितनी आबादी हो जाएगी? तो ऐसे नहीं कि त्रेता के अंत में ही 33 करोड़ देवात्माएँ परमधाम से नीचे उतर आती हैं। 5/10 करोड़ का हिसाब तो बाबा ने बताया, एक्यूरेट नहीं बताया। 5/10 करोड़ के बीच में ही होंगे। तो यह कोई बड़ी बात नहीं। तो 2 करोड़ ब्राह्मणों को सन् 76 तक संदेश मिलता है। जो संदेश देने वाले बन जाते हैं वो मल्टीप्लाई होते रहते हैं। संदेश का मल्टीफिकेशन होता रहता है। इसलिए अगले 12 वर्षों में 76 से लेकर 88/89 तक और 8 करोड़ मनुष्य आत्माओं को बड़े-बड़े जो मेले, सम्मेलन, प्रोग्राम्स होते रहे उससे संदेश मिलता रहता है और इस तरह त्रेतायुगी शूटिंग पूरी हो जाती है।

अब प्रश्न यह उठता है वहाँ बेसिक में तो ब्रह्मा-सरस्वती वाली आत्माएँ और ब्राह्मण आत्माएँ संदेश देने के लिए निमित्त बनीं। यहाँ एडवांस पार्टी की आत्माएँ बहुतों को दिखाई भी नहीं पड़तीं। जो कनेक्शन में आने वाले हैं, सम्पर्क में आने वाले हैं वही जानते हैं कि एडवांस पार्टी वाली आत्माएँ मेले, सम्मेलन और जो आयोजन, प्रदर्शनियाँ बगैरह होती हैं, उसमें कोई विशेष हिस्सा भी लेते नहीं देखे गए। वो कहाँ से निमित्त बन गए? आत्माओं का प्रतिनिधित्व करने वाली आत्मा (राम-सीता) दुनिया को संदेश देने के लिये कैसे निमित्त बन गए? त्रेता की जो आबादी उनके लिए आँकी गयी उसका हिसाब यह है कि सन् 76 में जब बाहरी दुनिया का विनाश नहीं हुआ, तो ब्राह्मण बच्चों को बाबा की मुरलियों, बाबा के ज्ञान से निश्चय जैसे उखड़ जाता है। बी0 के0 ब्राह्मण परिवार के जो सरपरस्त हैं वो सेवा इसलिए नहीं करते कि उन्हें ईश्वरीय कार्य में कोई निश्चय है, बल्कि वो तो सेवा इसलिए करते हैं कि उन सरपरस्तों अथवा मुखियाओं की बुद्धि में अच्छी तरह बैठ जाता है कि कोई एक दूसरी नई पार्टी निकल चुकी है जिसका मुकाबला हम ज्ञान और योग में नहीं कर सकते; इसलिए योग और सेवा के बड़े-से-बड़े प्रोग्राम आल इंडिया लेवल पर ही नहीं; लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय प्रोग्राम रख करके भी हम उन एडवांस पार्टी वाली आत्माओं का मुकाबला नहीं कर सकते। एडवांस पार्टी ही उनके शब्दों में शंकर पार्टीकही जाती है। हालांकि शिवबाबा के तो तीनों बच्चे बराबर हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तीनों जैसे भाई-भाई हैं; लेकिन उन्होंने पार्टी बाजी बना दी। शंकर पार्टी के नाम पर उन्होंने भय से ग्रस्त होकर योग और सेवा के जितने भी अन्तर्राष्ट्रीय प्रोग्राम रखे उनसे उस पार्टी का कोई बाल बाँका नहीं हो सका। अप एण्ड डाउन में आना बड़ी बात नहीं। यह यज्ञ तो आरम्भ से ही अप एण्ड डाउन में आता रहा। नईया डोलेगी; लेकिन डूबेगी नहीं। यह विश्वनवनिर्माण कार्य में तीन आत्माओं की विशेष मंडली है और यह मंडली इतनी सशक्त है कि आदि में दुनिया वाले कहते थे कि ओम मंडली गई-की-गई। जो आदि में हुआ वही अंत में होता है। अंत में ब्राह्मणों की दुनिया के अंदर जो अनिश्चय बुद्धि विनश्यन्ति होने वाले ब्राह्मण हैं वो भी यही कहने लगते हैं कि यह मंडली गई-कि-गई; क्योंकि ब्रह्मा की बातों पर तो उन्‍हें विश्वास रहता नहीं। वो सिर्फ़ दिखावे के लिये बाबा की ही मुरली पढ़ते हैं, ठीक वैसे ही जैसे झूठे ब्राह्मण सिर्फ़ पैसा कमाने के लिये गीतापाठ या कथाएँ करते हैं, गीता आदि के श्लोकों की गहराई में जाने की ज़रूरत नहीं समझते। ऐसे ही मुरलियों के महावाक्यों की गहराई पकड़ने की कोई कोशिश नहीं करते, अगर कोई जाता भी है तो कहते हैं, अरे! गहराई में जाने की कोई ज़रूरत नहीं, डूब जाओगे। तात्पर्य है कि 10 करोड़ आत्माओं को 88/89 तक राम-सीता वाली आत्माएँ ही संदेश देने के निमित्त बनती हैं और उनके साथ जो एडवांस पार्टी निमित्त बनती है, उससे भय ग्रस्त होकर ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ ईश्वरीय सेवा के बड़े-बड़े प्रोग्राम रखते हैं, ताकि लोगों की बुद्धि का डायवर्शन एडवांस पार्टी के ऊपर न चला जाए। वरना तो जिनका निश्चय उखड़ चुका वो ईश्वरीय सेवा के प्रोग्राम क्यों करेंगे? उन्हें ये ही पता नहीं है कि स्वर्ग की स्थापना कब होनी है, पुरानी दुनिया का विनाश कब होगा? जिनके पास ब्राह्मण जीवन का कोई लक्ष्य ही नहीं है वो दूसरों को लक्षण कैसे दिखायेंगे? वो तो सिर्फ़ अपनी पेट पूजा के लिये धंधा चलाते हैं। भयग्रस्त होकर दुनिया को संदेश देते हैं। वास्तव में उनकी अपनी इच्छा संदेश देने की नहीं है; लेकिन मजबूरी है; क्योंकि उस बाहरी दुनिया को तो पहले ही छोड़ चुके, अब इस दुनिया को छोड़ करके जायेंगे तो और ही लोग हँसी उड़ायेंगे, इसलिये बिचारे बंधन में हैं। तो संदेश देने के बंधन में होने और शंकर पार्टी द्वारा जैसे धक्के से चलने कारण, वो पुष्करणी ब्राह्मण हुए। पुश् माने धक्का, धक्का परेड करने वाले ब्राह्मण। उनको कोई विशेष आत्माओं का धक्का लग रहा है जिसके आधार पर वो धक्के से प्रभावित होकर दूसरी आत्माओं को, दुनियावी आत्माओं को मात्र संदेश दे रही हैं। अपने मन की, दिल की स्वेच्छा से नहीं। तो संदेश देने का श्रेय किसको पहुँचा? राम-सीता वाली आत्माओं को अर्थात् शंकर-पार्वती जैसी आत्माओं को, एडवांस पार्टी की विशेष मुख्य आत्माओं को उसका श्रेय मिलता है।

सन् 78 से 88/89 का यह त्रेतायुगी शूटिंग का पीरियड 12 साल का है। यह त्रेतायुगी शूटिंग के 12+1रूंग वर्ष=13 वर्ष 1990 सन् में पूरे हो जाते हैं।

उसमें भी सन् 87/88 में अव्यक्त बापदादा सारा ही सीजन, सारा ही वर्ष गुलजार दादी में नहीं आये। सन् 76 से बीजरूप राम बाप में ब्रह्मा रूपी चंद्रमा की सोल और शिव की सोल की प्रवेशता होती है। तो ब्रह्मा की सोल संग के रंग से बीजरूप स्टेज में टिकते-2 100 वर्ष की आयु पूरी होते-2 बीच-2 में बीजरूप की परिपक्व अवस्था में पहुँचती है। जो मनन-चिंतन-मंथन का माद्दा है, अभ्यास है वो परिपक्व हो जाता है। 87 और 88 में जब परिपक्वता आ जाती है तो निर्णय शक्ति और परख शक्ति में भी परिपक्वता आती है। इसलिए पूरा ही वर्ष अव्यक्त बापदादा ने बेसिक नॉलेज से संन्यास लेकर सारी ताकत एडवांस पार्टी की प्रत्यक्षता में लगा दी। ब्राह्मणों की दुनियाँ के अनुसार 87/88 में ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष पूरी होती है। 100 वर्ष आयु पूरी होने के बाद ब्रह्मा मृत्युलोक में समाप्त हो जाता है। शास्त्रों में भी ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष बताई है। मृत्युलोक में ब्रह्मा की आयु ख़त्म होगी तो अमरलोक अर्थात् वैकुण्ठ लोक में ही कृष्ण का जन्म होगा। इसलिए शास्त्रों में दिखाया है - पीपल के पत्ते पर गर्भमहल रूपी अण्डे में कृष्ण बड़े आराम से बैठा हुआ है। उसको कोई भी तक़लीफ़ नहीं है। वो पीपल के पत्ते की हल्की-फुल्की नवैया संसार सागर में पड़ी हुई है। पीपल के पत्ते में ये खासियत होती है कि थोड़ा-सा भी हवा का झोंका आयेगा तो पत्ता तेजी से हिलेगा। माया का थोड़ा-सा हिलकोरा आता है और वो आत्मा तेजी से हिलने लग पड़ती है। पीपल के पत्ते की नवैया भले कितनी भी हिलेगी, डुलेगी लेकिन वो डूबेगी नहीं- ये भक्तिमार्ग में गायन है। संसार सागर में उस नैया को कितने भी भारी ते भारी हिलोरे आयें, माया के झलकोरे आयें; लेकिन कृष्ण की सोल को ये निश्चय है कि सत्य की नैया डोलेगी; लेकिन डूबेगी नहीं।

गाया हुआ है, सच की नाव हिलेगी; लेकिन डूबेगी नहीं। (मु.14.6.85 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें

याद रखो, सच्चे बाप को अपने जीवन की नैया दे दी, तो सत्य के साथ की नाव हिलेगी; लेकिन डूब नहीं सकती। (अ.वा.3.5.77 पृ.119 आदि) मुरली प्रूफ देखें

इसलिए बड़े आराम से गर्भ महल में अँगूठा चूसता हुआ दिखाया गया है। अँगूठे के आकार की आत्मा दिखाते हैं, शालिग्राम। अँगूठा है आत्मा की यादगार। आत्मा के मनन-चिंतन-मंथन से वो आत्मा बीजरूपी स्टेज में स्थिर हो जाती है। 87/88 में वो आत्मा गर्भमहल में प्रवेश कर जाती है। जहाँ आराम से बच्चा जीवित रहता है। पीपल का पत्ता दिखाया हुआ है। वो पीपल का पत्ता कोई दूसरी आत्मा नहीं है, रूद्रमाला का आखरी मणका है। जो रूद्रमाला के मणकों के बीच में सबसे हल्का पुरूषार्थी है। उसमें ब्रह्मा उर्फ कृष्ण की आत्मा प्रवेश करती है। इसलिए भक्तिमार्ग में ये प्रतीकात्मक चित्र बनाया है। ये संगमयुग का गायन है; क्योंकि वो पत्ता अपने को पहले-पहले अर्पण करता है। इसलिए उसके अर्पण होने का भी विशेष महत्त्व है। उसको डूबने नहीं दिया जा सकता। कृष्ण बच्चे का वो पहला जन्म है जैसे लौकिक दुनिया में शरीर छोड़ करके आत्मा गर्भ में प्रवेश करती है। वो प्रत्यक्ष जन्म तो नहीं है; लेकिन माँ के गर्भ के अंदर परोक्ष जन्म हो जाता है। माँ को पहचान हो जाती है कि कोई आत्मा ने प्रवेश कर लिया। आत्मा प्रवेश करती है तो अंदर चुर्र-पुर्र होती है। दूसरों को पता नहीं लगता तो माँ के लिए जैसेकि बच्चे का जन्म हो गया। ये गर्भमहल के अंदर प्रवेशता रूपी पहला जन्म है। जिसका रिजल्ट ये हुआ कि कृष्ण की सोल जब गर्भ महल में प्रवेश करेगी तो कुछ तो परिवर्तन दिखाई देगा ना। जो मुरली में बोला है - कृष्ण जन्मता है जैसे रोशनी हो जाती है।(मु.ता.10.11.76 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें

सारी उथल-पुथल हो नई दुनिया बन जावेगी। जैसे बाबा इनमें आकर बैठते हैं वैसे आत्मा बिगर कोई तकलीफ गर्भ महल में आकर बैठती है। जैसे कृष्ण को पिपर(पीपल) के पत्ते पर दिखाते हैं ना। अभी कोई समुद्र में पिपर(पीपल) के पत्ते पर ऐसा कोई होता नहीं है। यहाँ दिखाया है कैसे आराम से रहते हैं। फिर जब समय होता है तो बाहर आ जाते हैं तो जैसे बिजली चमक जाती है; क्योंकि आत्मा सतोप्रधान चकमक बन गई ना। (मु.10.10.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें

 

89 में एक साथ एडवांस पार्टी में 9 कन्याएँ एक ही वर्ष के अंदर पहली बार समर्पित हो गईं। ब्राह्मणों की दुनियाँ में जब ये पता लगता है तो चमत्कार जैसा हो जाता है। एक सेकेण्ड के लिए बिजली-सी कौंधती है और फिर अंधकार हो जाता है; क्योंकि माया का पाम्प एण्ड शो का आडम्बर तो दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। भक्तों की बुद्धि उस आडम्बर में ही उलझ जाती है और ज्ञान की बातों में बुद्धि नहीं ठहर पाती। पीपल के पत्ते की नैया को ज्ञानसागर की ऊँची-नीची लहरें आगे बढ़ाती है, उमंग-उत्साह लाती हैं और निश्चय पक्का होता है। दक्षिण भारत की विदेशी आत्माएँ निकलती हैं और पीपल के पत्ते का निश्चय, जो घड़ी-घड़ी हिलता-डुलता है माया के हिलकोरे से उसे और पक्का कर देती हैं। वो निश्चय जैसे-जैसे पक्का होता जाता है, वैसे-वैसे द्वापरयुगी शूटिंग में ब्राह्मणों की जो एडवांस जनसंख्या है वो तेजी से बढ़ने लगती है और 8 वर्ष पूरे होते-होते द्वापरयुगी शूटिंग पूरी हो जाती है।

द्वापरयुगी शूटिंग में मुखिया आत्माएँ चित्र में दिखायी गयी है जिनको विशेष पार्ट बजाना है- इब्राहीम, बुद्ध और क्राइस्ट। ये हमारी ब्राह्मणों की दुनिया में कोई बीजरूप और आधारमूर्त आत्माएँ हैं, जो द्वापर की शूटिंग के अंत में विशेष रूप से प्रत्यक्ष होकर अपने-अपने धर्म की स्थापना, संवर्धन और विनाश का विशेष पार्ट बजाती हैं और ये प्रत्यक्ष भी होती हैं। इब्राहीम, बुद्ध, क्राइस्ट जो परमधाम से आने वाले हैं वो प्रत्यक्ष नहीं होंगे। पहले तो ब्राह्मणों की दुनिया के जो आधारमूर्त और बीजरूप आत्माएँ हैं, उनके प्रत्यक्ष होने की बात है; क्योंकि जब तक आधारमूर्त और बीजमूर्त आत्माओं के साथ धर्मपिताएँ प्रत्यक्ष न हों तब तक उनके फालोवर्स प्रजा को संदेश नहीं मिल सकता। उसका भी 8 वर्ष टाइम नूँधा हुआ है। 8 वर्ष एड किये जाएँ तो 98 आता है।

सन् 98 में जेल के अंदर कृष्ण बच्चे की प्रत्यक्षता होती है। ये है कृष्ण का पहला जन्म। वो तब होता है जब बच्चा बाहर आता है, संसार में प्रत्यक्ष होता है। जो शास्त्रों में प्रसिद्ध है कि जेल में प्रत्यक्ष हुआ। दिखाते हैं कि जब प्रत्यक्ष हुआ, जन्म लिया तो जेल के फाटक खुल गये और बच्चा स्वतंत्र होकर बाहर निकल गया। कंस ने बहुत बाँधना चाहा, बहुत बाँधा-बाँधी की; लेकिन बाँध नहीं सका। ये भी बताया है कि जब कृष्ण का जन्म होता है तो संसार में बिजली-सी कौंध जाती है। 98 में ब्राह्मणों की दुनिया में खास कर तथाकथित ब्राह्मणों की दुनिया में बिजली-सी कौंध गई जब वो कृष्ण बच्चा जेल से स्वतंत्र हो गया। उन्हें स्वप्न में भी ये विश्वास नहीं था कि अब जेल से बाहर होना भी हो सकता है; लेकिन नर चाहत कछु और है, होवत है कछु और। जैसे ब्राह्मण कुल में बच्चे का जन्म होता है तो पहला जन्म मानते हैं और ब्राह्मण का दूसरा जन्म तब माना जाता है जब यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। यज्ञोपवीत धारण करने का मतलब है तीनों सूत्रों की पहचान हो जाना कि असली प्रैक्टिकल देहधारी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर कौन है। ये बात कृष्ण उर्फ दादा लेखराज ब्रह्मा की बुद्धि में बैठ जाती है। ये उनका द्विजन्मा जन्म होता है। इसलिए ब्राह्मणों के 2 जन्म हो जाते हैं।

एक तो गर्भ का जन्म (अर्थात्) गर्भ के अंदर आत्मा प्रवेश करती है जो माँ को ही पता चलता है। दूसरा ब्राह्मणों की दुनिया को जन्म का पता चलता है और तीसरा सारी दुनिया को पार्ट का पता चल जाता है। जो ज्ञान के आधार पर जन्म होता है। ब्रह्मा उर्फ कृष्ण की सोल अपने स्वरूप को पहचान लेती है कि मैं भगवान नहीं हूँ। गीता का साकार भगवान बाप है; मैं तो सतयुग का प्रिन्स बनने वाला बच्चा हूँ। ये असलियत बुद्धि में बैठती है। ये प्रत्यक्षता रूपी जन्म की बात है। इसलिए कृष्ण को शास्त्रों में द्वापरयुग में डाल दिया। कृष्ण द्वापरयुग में नहीं आया; लेकिन कृष्ण की आत्मा ने दिव्य जन्म लेने का जो विशेष पार्ट बजाया है वो द्वापर में बजाया और जो महाभारी महाभारत युद्ध कराने का विशेष पार्ट बजाया है वो भी विशेष द्वापरयुगी शूटिंग के अंत अर्थात् कलहयुगी शूटिंग में बजाया। इसलिए शास्त्रों में कृष्ण को द्वापरयुग में ठोक दिया। उसी संगमयुगी कृष्ण की यादगार शास्त्रों में है। सतयुग में जन्म लेने वाले कृष्ण की यादगार शास्त्रों में नहीं है और न होगी, वहाँ कंस होता ही नहीं।

98 में भी एक वर्ष रुंग का जोड़ा जाए तो 99 आ जाता है। 99 का आना माना द्वापरयुगी शूटिंग पूरी होना। द्वापरयुगी शूटिंग जब पूरी होती है तो जैसे सतयुगी शूटिंग में तीन अवस्थाओं की पूर्ति हुई और सन् 1973 में तमोप्रधान कलियुगी शूटिंग की शुरुआत हुई तो मेले-मलाखड़े शुरू हो गये। ऐसे ही द्वापरयुगी शूटिंग की पूर्ति होते-2 एडवांस पार्टी में भी ब्राह्मणों की दुनिया में मेले की शुरुआत हो जाती है; लेकिन ये मेला उन मैला बनाने वाले मेलों की तरह नहीं है। क्यों? क्या कारण है? उन मेलों में मैला क्यों इकट्ठा होता है? और ये जो विशेष मेला है जिस मिलन मेले से आत्माएँ आधा कल्प के लिए पवित्र बन सकती हैं उसमें क्या विशेष खास बात होती है? सन् 73 आदि से होने वाले उन मेलों में साकार में भगवान नहीं होता। साकार में भगवान के साथ मिलन मेला नहीं होता। आत्माओं-आत्माओं का, नदियों-नदियों का मेला होता है; इसलिए उन मेलों में मैला इकट्ठा होता है और इस मेले का तो नाम ही है- आध्यात्मिक गंगा सागर मेला।कैसे मेले की शुरुआत है? ये भी एडवांस पार्टी में पहले-2 बड़े विराट संगठन की शुरुआत है। अंतिम रूप नहीं है; इसलिए कुछ न कुछ अनिश्चय बुद्धि आत्माओं के द्वारा इस मेले में भी मैला डालने की शूटिंग होने की सम्भावना रही होगी; परन्तु अंत का रूप तो विराट रूप होगा। तो जो शुरुआत है, उसमें बाप की प्रत्यक्षता की भी शुरुआत है। नहीं तो भक्तिमार्ग में इतने बड़े-2 जो मेले मनाये जाते हैं, वो किस बात की यादगार है? ज़रूर भगवान बाप से संगठित रूप में मिलन मेला मनाया है। जिसकी यादगार ये मेले चल रहे हैं; लेकिन वो मेले भक्तिमार्ग के हैं। यह हुआ आध्यात्मिक गंगा सागर मेला जो कलकत्ते में सन् 2000 में हुआ।

उसके बाद होती है शूद्र वर्ण की आत्माओं की कलियुगी चार वर्षीय शूटिंग, जो 2000 से 2003 तक चलती है। जो दुनियावी धर्मपितायें (इब्राहीम, बुद्ध, क्राइस्ट) हैं जो परमधाम से द्वापर-कलियुग में उतरते हैं, उनके आधार और बीज (उनसे भी पहले) प्रत्यक्ष होने लग पड़ेंगे और 2004 है रूंग वर्ष। (उसके बाद प्रैक्टिकल शूटिंग शुरू होती है।) चारों युगों की शूटिंग का रहस्य जिसकी बुद्धि में आ गया वो कभी हिलेगा नहीं। न खुद हिलेगा, न दूसरों को हिलायेगा। अज्ञानता के कारण खुद हिलना और दूसरों को हिलाने का काम होता है। कोई आत्माओं का पार्ट चलता है थमाने का और कोई आत्माओं का पार्ट चलता है अज्ञानता के कारण भगाने का। जो ज्ञानी तू आत्माएँ होंगी वो सबको थमाने का काम करेंगी अर्थात् ज्ञान में निश्चयबुद्धि बनाने के कार्य में थमाने का काम करेंगी और जो अज्ञानी (आत्माएँ) होंगी वो दूसरों को हिलाने का और भगाने का काम करेंगी। जो ब्राह्मणों की दुनियाँ में सृष्टि चक्र का चार युगों का आवर्तन होता है, उसमें मूँझने की कोई बात नहीं है।

पहले युग की शूटिंग होती है तो पहली प्रत्यक्षता में जगतपिता शंकर भोलेनाथ मनुष्‍य सृष्टि के बाप की प्रत्यक्षता नूँधी हुई है। दूसरी त्रेतायुगी शूटिंग पूरी होती है तो बाप का बच्चा कौन? बाप कृष्ण बच्चे के द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं। तो कृष्ण बच्चे की गर्भमहल वाली प्रवेशता रूपी जयंती नूँधी हुई है; क्योंकि त्रेतायुगी शूटिंग है तो त्रेतायुगी शूटिंग में मुखिया आत्मा कौन मानी जाती है? राम बाप वाली आत्मा। रामवाली आत्मा के द्वारा कृष्ण की प्रवेशता रूपी जन्म नूँधा हुआ है। द्वापरयुग की शूटिंग के अंत में उस बच्चे की प्रत्यक्षता किसके द्वारा होती है? बच्चा जन्म किससे लेता है? लेता तो माँ से है; लेकिन जन्म देने का निमित्त कौन माना जाता है? बाप माना जाता है। ये सब बातें शूटिंग पीरियड की हैं। कृष्ण की सोल जो गर्भ महल में पीपल के पत्ते रूपी हल्की नवैया पर चमत्कारी पार्ट बजाय रही है। ये अवतार शास्त्रों में नूँधा हुआ है। संभवामि युगे युगे।हर युग में प्रत्यक्ष होता हूँ, जन्म लेता हूँ, अवतरित होता हूँ। तो चार युगों में कितने अवतार हुए? चार अवतार हुए। तो तीसरा ये हुआ। पहला शिव-शंकर भोलेनाथ, दूसरा राम, तीसरा कृष्ण और लास्ट में कलंकी अवतार की भी प्रत्यक्षता हो जाती है। कलियुगी शूटिंग के शुरुआत में कलंक शुरू होते हैं। विष्णु है सम्पूर्णता का रूप और कलंकी है अपूर्णता का रूप। ये पाँव और चोटी मिलते हैं तो प्रत्यक्षता हो जाती है। जब मंदिर की परिक्रमा करते हैं तो गुलाटी लगाते हुए परिक्रमा करते हैं। सर नीचे, पाँव ऊपर। फिर पाँव नीचे, सर ऊपर। तो गुलाटी लगाते समय सर और पाँव दोनों मिलकर एक हो जाते हैं।

शास्त्रों में फिर युगे-2 कह दिया है, एक-2 युग के बाद अवतार लेते हैं। बाप समझाते हैं मैं युगे-2 नहीं आता हूँ; परंतु पुरुषोत्तम कल्प के संगमयुगे आता हूँ। (मु.14.9.74 पृ.1 मध्यांत)

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इस तरह चार युगों में ये चार अवतार विशेष नूँधे हुए हैं। इसमें संशय में आने की बात नहीं है। ये चार युगों की शूटिंग नूँधी हुई है। जैसे साकार दुनियाँ में ड्रामाबाजियाँ चलती हैं तो उनमें तीन/चार सीन होते हैं। ये भी बेहद का ड्रामा है। इस ड्रामा को भी साक्षी होकर देखना चाहिए। जो साक्षी होकर देखते हैं वो कभी हिलते नहीं हैं। नहीं तो माया रावण अज्ञानता की नींद में सुलाय के हिलाती-डुलाती रहती है। जैसे कोई सोते-2 सपने में भयभीत हो जाता है, छक्के छूट जाते हैं। तो ऐसे ही यहाँ भी होता है। माया की अज्ञानता की नींद से अपने को बचाना है। बाप के जागती ज्योति बच्चे बनना है। किसी बात में मूँझने की बात नहीं है। जो कुछ भी ड्रामा में चल रहा है सब कल्याणकारी है। कोई बात में अकल्याण की बात नहीं है और हिलने-डुलने की तो बात ही नहीं। अमरनाथ के अमर बच्चे हैं। अमरनाथ बाप है तो बच्चे भी अमर हैं। माया हिलायेगी, डुलायेगी, अचेत कर देगी। लक्ष्मण को क्या हुआ? अचेत कर दिया; लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही है कि खलास हो जायेंगे। खलास होने की बात नहीं है।

2000 से 2003/04 तक तामसी शूटिंग भी पूरी हुई। यज्ञ के कितने वर्ष पूरे हो गए? 70 वर्ष पूरे हो गए। ज्यादा से ज्यादा 100 साल का संगमयुग है। त्रिदेव हैं। तो हरेक मूर्ति के लिए कितना टाइम हुआ? 33 साल। ब्रह्मा बाबा ने जब शरीर छोड़ा तो कितने साल पूरे हुए? 33 साल। 1936 से 1969 तक 33 साल फिर ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में एडवांस पार्टी का जो ज्ञान की वृद्धि का प्रत्यक्ष कार्य है उसको पूरा होने में भी 33 साल लगते हैं। 1969 से 2002 तक 33 साल हुए। अभी फिर ब्राह्मणों की दुनिया के सामने तीसरी मूर्ति आनी चाहिए; लेकिन तीसरी मूर्ति दिखाई नहीं पड़ रही है। उसका भी कोई कारण है- हरेक मूर्ति को प्रत्यक्ष होने के लिए अंतराल भी लगता है।

जैसे 1936 से 1947 तक जब तक स्वर्ग का मॉडल तैयार हुआ और ब्रह्मा में शिव की प्रवेशता साबित हुई तब तक 10 साल में ब्रह्मा को किसी ने नहीं जाना; क्योंकि ब्रह्मा नाम पड़ता ही तब है जब शिव बाप प्रवेश करे। मुरली में आया है कराची से मुरली निकलती चली आयी। ब्रह्मा के तन में सन् 47 में प्रवेशता हुई। तो 1947 में ब्रह्मा प्रत्यक्ष हुआ; लेकिन सबके सामने इकट्ठा प्रत्यक्ष नहीं हुआ। नम्बरवार (बच्चों) ने पहचाना। बाहर नाम तब प्रत्यक्ष हुआ जब दिल्ली में कमला नगर सेन्टर खुला और उसका नाम डाला गया ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय।तो ब्रह्मा माँ को प्रत्यक्ष होने में 1936/37 से लेकर 1951/52 तक कितने साल लगे? 16/17 साल। पहली मूर्ति को प्रत्यक्ष होने में 16/17 साल लग गये, फिर दूसरी कौन-सी मूर्ति काम करती है? तीन मूर्तियाँ हैं ना- ब्रह्मा की मूर्ति, विष्णु की मूर्ति, शंकर की मूर्ति। ब्रह्मा की मूर्ति तो प्रत्यक्ष हुई फिर दूसरी मूर्ति कौन-सी प्रत्यक्ष होती है? शिव तो निराकार है, उनकी बिन्दी का नाम शिव है। तो मूर्ति के रूप में शंकर की मूर्ति प्रत्यक्ष हुई। शंकर की मूर्ति को प्रत्यक्ष होने के लिए कितना टाइम चाहिए? 16/17 साल का ही चाहिए या कम चाहिए? कोई मकान का फाउण्डेशन डाला जाता है तो फाउण्डेशन डालने में, पहली मंजिल बनाने में ज्यादा टाइम लगता है। इसलिए पहली मूर्ति को प्रत्यक्ष होने में 16/17 साल लग गए। दूसरी मूर्ति है शंकर। दूसरी मूर्ति को प्रत्यक्ष होने में कितना टाइम चाहिए? 8 साल तो ज़रूर चाहिए तो सन् 69 से वो दूसरी मूर्ति शूद्र से ब्राह्मण बनती है। उस ब्राह्मण को भी मूर्ति के रूप में प्रत्यक्ष होने के लिए टाइम चाहिए 8/9 साल। सन् 77 हुआ सम्पूर्णता वर्ष। तो 69 से 77 तक कितने साल हुए? 8/9 साल। ऐसे ही दूसरी मूर्ति का जो शूटिंग पीरियड है, मनन-चिंतन-मंथन का काल है, वो चारों युगों की शूटिंग का काल 2004 में रूंग वर्ष सहित समाप्त होता है। तीसरे नेत्र का मनन-चिंतन का काम पूरा होता है। तो फिर कौन-सी मूर्ति आनी चाहिए? तीसरी मूर्ति विष्णु की मूर्ति चाहिए जो प्रैक्टिकल में कार्य को सम्पन्न कर सके; क्योंकि दाढ़ी-मूँछ वाला ब्रह्मा तो पतित ही है। उसकी पूजा भी नहीं होती, मन्दिर नहीं बनते, मूर्तियाँ भी नहीं बनतीं और शंकर को तो बहुरूपी दिखाया गया है। अमृत बाँटता है, विष पीता है। तो शैव सम्प्रदाय वाले भी पवित्रता को उतना ध्यान नहीं देते। भक्तिमार्ग में ब्रह्मसमाजी भी हैं, शैव सम्प्रदाय भी हैं और वैष्णव सम्प्रदाय के भी हैं। ज्यादा प्योरिटी की भासना किसमें होती है? वैष्णव सम्प्रदाय वालों में। प्योरिटी से ही प्रैक्टिकल होता है। तो उनका जो मुखिया विष्णु देवता (अथवा) वैष्णव देवी है उसको भी प्रत्यक्ष होने में कुछ टाइम चाहिए या नहीं चाहिए? कितना टाइम चाहिए? ब्रह्मा पहली मूर्ति को प्रत्यक्ष होने में 16 साल, दूसरी मूर्ति शंकर को प्रत्यक्ष होने में 8 साल तथा तीसरी मूर्ति को कम से कम 4 साल तो चाहिए। वो कब पूरे होते है? 2008 में तीसरी मूर्ति प्रत्यक्ष होनी चाहिए। पहली मूर्ति ब्रह्मसमाजियों के सामने प्रत्यक्ष हुई होगी पहले-पहले या रूद्रमाला के मणकों के बीच में प्रत्यक्ष हुई होगी या वैष्णव सम्प्रदाय वालों के बीच में प्रत्यक्ष हो गई होगी? ब्रह्मा की मूर्ति ब्रह्मा के फालोवर्स में ही प्रत्यक्ष होगी। शंकर की मूर्ति; शिव शंकर को मिलाकर एक कर दिया गया तो ज़रूर शैव सम्प्रदाय वालों के बीच में ही प्रत्यक्ष होगी। सन् 76 से भी प्रत्यक्षता हुई तो जिनके बीच प्रत्यक्षता हुई वो शिव के फालोवर्स शैव कहे जायेंगे। ऐसे ही जो विष्णु की मूर्ति प्रत्यक्ष होगी वो रूद्रमाला के मणकों के बीच में प्रत्यक्ष हो जावेगी, ब्रह्मसमाजियों के बीच में प्रत्यक्ष हो जावेगी या उन विष्णुपंथियों का अपना कुल है? वैष्णव कुल कहा जाता है। विष्णु देवी कही जाती है। भारत माता शिव शक्ति अवतार अंत का यही नारा है। तो उनको भी 4 साल चाहिए और 4 साल पूरे होने के बाद वो अपने कुल में पहले प्रत्यक्ष होती है। वो राधा सो लक्ष्मी बनने वाली आत्मा है। राधा कौन-से कुल की होती है? जो चंद्रवंशी घराना होगा, ज्ञान चंद्रमा ब्रह्मा को पक्का-2 फॉलो करने वाले होंगे, और कोई देहधारी को फॉलो करने वाले नहीं होंगे, उनके बीच में ही प्रत्यक्ष होगी। ऐसे नहीं कि रूद्रमाला का घराना उनको पहले पहचान लेगा, उनके बीच में प्रत्यक्षता हो जावेगी। तो टाइम लग जाता है। दो देवताओं की शूटिंग पूरी निमित्त मात्र हो गई। फिर कौन-सा देवता रह गया? विष्णु रह गया। तो तीसरा देवता 2004 के बाद अपना कार्य तेजी से आरम्भ करता है। इसलिए 15.10.04 की अ.वा. में सर्व अफ्रीका कोर ग्रुप से बात करते हुए बापदादा ने वो भी इशारा दे दिया कि बापदादा ने भी समाचार सुना, अफ्रीका के उमंग-उत्‍साह की मुबारक हो। पहला नंबर शुरू किया है, उसकी मुबारक। ऐसे सभी को नंबरवार करना है; लेकिन पहले पान का बीड़ा उठाया है, अच्‍छा है। प्‍लैन भी अच्‍छा है। वहाँ के हैण्ड्स निकालके वहाँ सेवा कराना, यह प्‍लैन बहुत अच्‍छा है; क्‍योंकि और कहाँ से हैण्ड्स कम ही मिलते हैं और वहाँ से वहाँ के अनुभवी होते हैं।--- यह प्‍लैन सबसे अच्‍छा लगा और सहज विधि हो गई ना। हैण्ड्स भी मिलेंगे और सेवा भी बढ़ गई। (अ.वा.15.10.04 पृ.6) मुरली प्रूफ देखें

असली सेवा अफ्रीका वालों ने शुरू की है, जो अभी तक न बेसिक ब्राह्मणों ने की है और न एडवांस वालों ने की है। तो तीसरी मूर्ति भी प्रत्यक्ष होती है। तीसरी मूर्ति की प्रत्यक्षता सूर्यवंश में होगी या पहले चंद्रवंश में होगी? विजयमाला चंद्रवंशियों की माला है, रानियों की माला है, तो प्रत्यक्षता भी कहाँ से होगी? बच्चा पैदा होता है तो अपने घर-परिवार वालों के बीच में पहले प्रत्यक्ष होता है या दुनिया में प्रत्यक्ष होता है? प्रश्न करते हैं विष्णु कहाँ है? दूसरी मूर्ति शंकर का पार्ट पूरा हुआ, तो तीसरी मूर्ति तो है ही नहीं। कोई तो ऐसे जट बुद्धि हैं कि समझते हैं- अरे, तीसरी मूर्ति विष्णु का पार्ट शुरू हो गया तो विष्णु कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। जैसे भक्तिमार्ग में भगवान कहीं दिखाई नहीं पड़ा तो क्या समझकर बैठ गए? शिवोऽहम्। ऐसे ही यहाँ भी 2004 के बाद विष्णु कहीं दिखाई नहीं पड़ा तो क्या समझकर बैठ गए? विष्णुऽहम्। ब्रह्मास्मि तो ब्रह्मा सो विष्णु भी अस्मि। अब यह पता नहीं है कि जब विष्णु प्रत्यक्ष होगा, तो 33 करोड़ देवताओं के बीच में विष्णु परम पवित्र पार्ट है या अपवित्र पार्ट है? (किसी ने कहा-पवित्र पार्ट है)। उस ग्रुप के अन्दर सुख-शांति का नज़ारा देखने में आवेगा या दुख-अशांति, अपवित्रता और झूठी बातें देखने को मिलेगी? सुख-शान्ति होगी। नो विष एट आल, विषय-विकार का नाम-निशान नहीं हो, उसको कहेंगे विष्णु। विष्णु एक होता है या दो होते हैं? परिपक्व स्टेज वाली दो आत्माएँ प्रत्यक्ष देखने में आएँ तब कहेंगे विष्णु। इस झूठे ब्राह्मणों की दुनिया में तो विष्णु ढेर-के-ढेर देखने में आ गए। अहमदाबाद में विष्णु, हैदराबाद में विष्णु, बम्बई में विष्णु और तो और फर्रुखाबाद के नज़दीक इटावा, बिधुना में विष्णु। तो रुद्राक्ष के मणकों में अनेक-अनेक आत्माएँ प्रवेश करती हैं, उनमें कोई-कोई पावरफुल भी तो होंगी, तो पावरफुल आत्माएँ प्रवेश करती हैं, तो वो ढेर-के-ढेर फॉलोवर्स भी बनाय लेते हैं। तो विष्णु भगवान के अवतार ढेर बन गए। यह प्रत्यक्षता की निशानी है! बात यह है कि असली प्रत्यक्षता तो विष्णु की है ना! ब्रह्मा सो विष्णु। तो ढेर-के-ढेर विष्णु पार्टियाँ बन गईं; क्योंकि शंकर का काम, दूसरी पार्टी का काम पूरा हुआ, अब तीसरी मूर्ति प्रत्यक्ष होनी चाहिए या नहीं? विष्णु पार्टियाँ ढेर-की-ढेर तैयार हो रही हैं और आगे चलकर और भी ढेर-के-ढेर भगवान निकलेंगे। मति भ्रम पैदा करेंगे। सैकड़ों की तादाद में निकलेंगे। तो यह प्रैक्टिकल पार्टी विष्णु के द्वारा फाउंडेशन की निशानी है!

फिर अभी एडवांस पार्टी में क्या चल रहा है? ज्ञान की वृद्धि पूरी होती है उसके बाद नई दुनिया के फाउंडेशन की शुरुआत होती है। पूड़ी पकती है तो ऊपर दिखाई पड़ती है। ऐसे ही 2004 में अ.वा. में नई दुनिया के फाउंडेशन की बात प्रत्यक्ष कर दी गई।

नव युग रचता बापदादा ने आप सबको गोल्डन वर्ल्‍ड की सौगात दी है, जो अनेक जन्म चलने वाली है। विनाशी सौगात नहीं है। अविनाशी सौगात बाप ने आप बच्चों को दे दी है। याद है ना! भूल तो नहीं गये हो ना! सेकण्ड में आ-जा सकते हो। (अ.वा.31.12.04 पृ.50 आदि) मुरली प्रूफ देखें

तुम बच्चों को नई दुनिया की सौगात मिल गई। अभी ज्ञान से देखने की बात है। नई दुनिया का फाउंडेशन कहीं न कहीं पड़ गया। चुनाव होना शुरू हो गया। त्रिदेव भी प्रत्यक्ष हुए। तीन मूर्तियाँ शिव की हैं ना! तो 2004 पूरे होते-होते तीनों देवताएँ प्रत्यक्ष हुए या नहीं हुए? हो गए। उसके बाद प्रत्यक्षता है अष्टदेवों की, वो फाउंडेशन भी शुरू हो गया। विष्णु का भी कोई बीज होगा या नहीं होगा? ता. 31.10.2006 की अव्यक्त वाणी के पृ.3 के आदि में अव्यक्त बापदादा ने कहा है कि सिर्फ़ 2 नंबर आउट हुए हैं, बाप और माँ। अभी कोई भी भाई-बहन का तीसरा नंबर आउट नहीं हुआ है।

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25.11.95 पृ.40 मध्य की अ.वाणी में तो बापदादा ने बता दिया था कि सीट फिक्स कोई नहीं हुई है। सिवाय ब्रह्मा बाप और जगदम्बा के। और सब सीट खाली हैं।मुरली प्रूफ देखें

फिर अलग से 2006 की वाणी में बापदादा ने क्यों बोला कि सिर्फ़ 2 नंबर आउट हुए है, बाप और माँ। ? ज़रूर वो कोई दूसरा मणका है स्त्री चोला, काशी नगरी के रूप में माना जाता है, वो स्त्री चोला ही यूनिटी बनाने में फाउंडर है। जो प्योरिटी के आधार पर रुद्रमाला की यूनिटी फिर भी तैयार होती है। जो यूनिटी बनाने में न लक्ष्मी सफल होती है, न जगदम्बा सरस्वती सफल होती है। वो रुद्रमाला का मणका सफल होता है; लेकिन वो यूनिटी प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है, पर्दे के अन्दर रहती है; इसलिए दुनिया में उसी समय से देखा होगा कि जितनी भी बिल्डिंगें बनती हैं, उनको चारों तरफ से पर्दा लगाकर सुरक्षित कर देते हैं (जिससे) कोई की आँख न लगे। फाउंडेशन जमीन के अन्दर खोदकर डाला जाता है। बाहर से दिखाई नहीं पड़ता।

फिर अभी ब्राह्मण बच्चों के मन में प्रश्न उठता है कि विनाश कब होगा? बाबा ने तो बोल दिया जब सब विनाश की बात से निश्चिन्त हो जायेंगे कि अब कुछ भी नहीं होना, तब अचानक विनाश हो जावेगा। विनाश का समय कभी भी फिक्स नहीं होना है, अचानक होना है। बापदादा ने पहले से ही इशारा दे दिया है। उस समय नहीं उलाहना देना कि बाबा, थोड़ा इशारा तो देते। अचानक होना है, एवररेडी रहना है। (अ.वा.ता. 3.4.97 पृ.57 म.) मुरली प्रूफ देखें

कई समझते हैं यह तो सिर्फ़ कहते रहते हैं- मौत आया कि आया। होता तो कुछ नहीं। इस पर एक मिसाल भी है ना- उसने कहा शेर है, शेर; परन्तु शेर आया नहीं। आखिर एक दिन शेर आ गया, बकरी सब खा गया। यह बातें सब यहाँ की हैं। एक दिन काल खा जायेगा। (मु.ता. 18.12.83 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें

बाहर की दुनियाँ की बात बाद में; अभी तो ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनियाँ के विनाश और स्थापना की विशेष बात है। तुम बच्चे जानते हो जब तक राजधानी स्थापन नहीं हुई है तब तक विनाश नहीं होगा। जितनी-जितनी राजधानी स्थापन होती जावेगी उतना-उतना विनाश होता जावेगा।

जब तक सूर्यवंशी राजधानी तुम्हारी स्थापन न हुई है तब तक विनाश नहीं हो सकता। (मु.10.1.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें

आगे चल दुनिया की हालत बिल्कुल खराब होनी है। खाने (के) लिए अनाज नहीं मिलेगा तो घास खाने लगेंगे। फिर ऐसे थोड़े ही कहेंगे, माखन बिगर हम रह नहीं सकते। (मु.5.3.76 पृ.3 अंत)

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बरसात आदि भी, नैचुरल कैलेमिटीज़ भी होंगी। यह सब अचानक होता रहेगा।... धरती भी ज़ोर से हिलती है। तूफान, बरसात आदि सब होता है। बॉम्ब्स भी फेंकते हैं; परंतु यहाँ एडीशन है सिविल वार। (मु.2.8.85 पृ.3 म.) मुरली प्रूफ देखें

अगर एक की भी बुद्धि में राजधानी पक्की स्थापन हो गई, नई दुनिया का नक्शा बुद्धि में बिल्कुल फिट बैठ गया तो वो एक के दृष्टि के आधार पर इस पुरानी सृष्टि का जैसे विनाश हुआ पड़ा है। आप मुये मर गई दुनिया। वो किसी की परवाह नहीं करेगा। ये अर्थक्वेक आदि ज़रूर होनी है, यहाँ तो बैठे-बैठे अचानक अर्थक्वेक होगी। कन्याओं-माताओं रूपी धरणी हिल पड़ेगी। ऐसे-ऐसे ग्लानि के बॉम्ब्स फूटेंगे जिनमें बाप की ही ग्लानि भरी हुई होगी। उन बॉम्ब के फूटने से जो निश्चय बैठा हुआ है वो उखड़ जावेगा, धरणी हिल जावेगी, जो भी ब्राह्मणों के बड़े-2 संगठन रूपी एक के ऊपर एक अनेक मंजिलें किले, महल-माड़ियाँ बने पड़े हैं, वो सब धराशाई हो जावेंगे। ताश के पत्तों की तरह गिरेंगे। एक तरफ बॉम्ब्स गिरेंगे। स्थूल बॉम्ब्स बाद में गिरेंगे, पहले ज्ञान के बॉम्ब्स गिरेंगे। दूसरी तरफ नैचुरल कैलैमिटीज़ भी आवेगी। वो तो स्थूल पानी की स्थूल बाढ़ होती है, ये ज्ञान जल का भी सैलाब है। जब ज्ञान जल का सैलाब आवेगा तो उसमें देहभान रूपी धूल की मिट्टी मिली हुई होगी। अनेक धर्म सम्प्रदाय वाले ज्ञान में अपनी-अपनी मिक्सचैरिटी करके ज्ञान का सैलाब लाने के निमित्त बन जावेंगे। ये चैतन्य ज्ञान नदियाँ बहुत बोड़म्बोड़ कर देंगी; क्योंकि देह-अभिमान की मिट्टी से भरी-पूरी होंगी। विधर्मियों के सम्पर्क-संसर्ग में आती हैं तो पतितों को पावन नहीं बनातीं, और ही पतित बना देती हैं। ज्ञान सागर में जब नदी मिलेगी तो शुद्ध हो जावेगी, सारा कचड़ा ज्ञान सागर में मिल जावेगा और कचड़ा मिल जाने के बाद जो नदियाँ सागर से मिलेंगी वो नदियाँ नाला नहीं कही जावेंगी, पतित-पावनी कहीं जावेंगी; क्योंकि पतित-पावन बाप के कार्य में सहयोगी बनेंगी और भगवान बाप ज्ञान सागर के सम्पर्क में आवेगी तो गंगा पतितों को पावन बनाने वाली बन जाती है।.........

अन्न का एक दाना भी नहीं मिलेगा। बेहद में अन्न किसे कहा जाता है। ज्ञान जल पेय है और अन्न है याद। याद का भोजन कहो (या) अन्न कहो। एक है शुद्ध याद- एक बाप दूसरा न कोई। दूसरी है- व्यभिचारी याद, अनेकों की याद। तो जो अनेकों की याद आती है वो जैसे खाद पड़ी हुई है। आज की धरणी में जैसे खाद पड़ती है तो धरणी बरबाद होती जाती है, व्यभिचारिणी बनती जाती है और अन्न में दोष पैदा हो जाता है, अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। एक बाप की याद ऐसी है जो सब बीमारियों को खलास कर देती है। बाढ़ आदि नैचुरल कैलिमिटीज़ के बाद धरणी का परिष्करण हो जावेगा और चैतन्य धरणी भी शुद्ध अनाज देगी। तन भी शुद्ध बनेगा और मन भी शुद्ध बनेगा। मन के अंदर जो भी वायब्रेशन चलेंगे, जो भी संकल्प चलेंगे वो सत संकल्प चलेंगे। जिन सत-संकल्पों से सतयुग की दुनिया की स्थापना होगी। अभी तो ऐसा टाइम आने वाला है कि जो असली अन्न देने वाला बाप है वो बिल्कुल गुप्त हो जावेगा। जिस बाप की दृष्टि से सृष्टि सुधरती है वो बाप गुप्त हो जावेगा तो याद का अन्न भी नहीं मिलेगा। आँखें जिसको देखती हैं तो उसकी नैचुरल याद आती है, पतित दुनिया ही दिखाई पड़ेगी तो पतितपने की ही याद आवेगी। बाप ही दिखाई पड़ेगा तो बाप ही याद आवेगा और बाप जब गुप्त हो जावेगा तब जो असली सात्विक याद रूपी अन्न है वो मिलना बंद हो जावेगा। विदेशों से स्टीमर आदि भी नहीं आवेंगे जो विदेशों से अनाज अंदर आ जावे। विदेशी अन्न का मतलब है जो विदेशी धर्मपितायें बाप बनकर बैठे हैं उनका भी सहयोग नहीं मिलेगा तो फेमन पड़ जावेगा। ये विनाश तो ज़रूर होना है। साधु -संत आदि ऐसे नहीं कहेंगे कि इस दुनिया का विनाश होना है। ये बाप ही आकर बताते हैं कि मैं जब आता हूँ तो दोनों कार्य साथ-साथ होते हैं। नई दुनिया की स्थापना भी होती है और पुरानी दुनिया का विनाश भी होता है।

सारी दुनिया को संदेश मिलने के बाद, सारी दुनिया की मनुष्य-मात्र आत्माओं को परमात्मा गॉड फादर का रियलाइजेशन होने के बाद आखरीन 5-7 रोज़ में ऐटम बमों के धमाकों के साथ ही जलमई और चतुर्थ विश्व युद्ध के साथ इस दुनिया का खात्मा हो जाएगा। 500-600 करोड़ मनुष्य आत्माएँ और कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षियों की भी आत्माएँ सब अपने-अपने शरीर छोड़ करके परमधामवासी बन जाएँगी। कुछ विशेष बीजरूप आत्माएँ इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर रहेंगी, जिन्होंने योगबल से अपनी श्वास-प्रश्वास क्रिया को सूक्ष्म कर लिया होगा, जिनके ऊपर ऐटमिक वातावरण का कोई असर नहीं पड़ेगा; क्योंकि उनकी श्वाँस-प्रश्वाँस क्रिया इतनी धीमी होगी कि उन्हें विशेष गहरी साँस लेने की दरकार ही नहीं पड़ेगी। उस समय ऐटमिक धमाकों से उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर जो बर्फ के पहाड़ जमे हुए हैं, वो पिघल जावेंगे और उनके पिघलने से समुद्र का जलस्तर ऊपर चढ़ जावेगा। जिसका अंजाम यह होगा कि रूस, यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप जिनका आज से 2500 वर्ष पहले मनुष्य के मस्तिष्क पटल पर नामनिशान भी नहीं था। जैसे अमेरिका, 500 वर्ष पहले मनुष्य जानता ही नहीं था कि अमेरिका खंड कहाँ है। है या नहीं? आज से 300 वर्ष पहले आस्ट्रेलिया का पता ही नहीं था। ऐसे ही जितने भी दूसरे धर्मखंड हैं जैसे अरब-खंड, मुस्लिम-खंड या क्रिश्चियन-खंड- ये भी आज से 2500 वर्ष पहले समुद्र के गर्त में समाये हुए थे- तो ये विनाशी धर्म-खंड जो न थे और न ऐटमिक धमाकों के बाद इस दुनिया में रहेंगे, समुद्र के गर्त में समा जाएँगे। एक अविनाशी खंड भारत ही रहेगा और चारों तरफ दुनिया में समुद्र ही समुद्र होगा। ऐटमिक धमाकों से जो दुनिया का वातावरण गर्म होगा उससे उत्तरी दक्षिणी ध्रुव की बर्फ पिघलकर समुद्र का स्तर तो ऊपर चढ़ेगा ही; लेकिन वातावरण की गर्मी से समुद्र का पानी भाप बनकर ऊपर उड़ेगा। वो भाप फिर बादल बनकर बरसेंगे और कई दिनों तक मूसलाधार बरसात होगी, पानी रुकेगा ही नहीं। जब पृथ्वी हिलेगी तो सब मकान गिर जावेंगे और सब मनुष्य दबकर मर जावेंगे। अपने-अपने पापों की सज़ायें भोगते रहेंगे। किसी की टाँग दबेगी तो किसी की बाँह दबेगी। कोई निकालने वाला तो होगा नहीं। तड़पते-तड़पते ही खलास हो जायेंगे और उनकी अंत मते सो गते हो जाएगी।

जो ज्ञान नहीं लेते, उनका विनाश हो जाता है। भक्तिमार्ग का विनाश, ज्ञानमार्ग वालों की स्थापना हो जाती है। वह सज़ायें भी खाते हैं। पद भी नहीं पाते। (मु.27.11.77 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें

विनाश तो होगा। सभी ख़त्म हो जावेंगे। बाकी कौन बचेंगे? जो श्रीमत पर पवित्र रहते हैं वही बाप की मत पर चल विश्व की बादशाही का वर्सा पाते हैं। (मु.6.9.76 पृ.1 अंत, 2 आदि)

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स्थूल विनाश होने के बाद नयी सृष्टि को जन्म देने वाली साढ़े चार लाख बीजरूप आत्माएँ बचेंगी, जिनमें आधी शंकर जैसी आत्माएँ और आधी पार्वती जैसी आत्माएँ होंगी। आधी पाप आत्माओं की लिस्ट वाली (दुर्योधन, दुःशासन की वृत्ति वाली) और आधी पुण्य आत्माओं की लिस्ट वाली आत्माएँ, जो ब्राह्मणों की दुनिया के हिसाब से कही गई हैं। बाकी वो कोई दुनियावी पुण्यात्मा, पापात्मा नहीं हैं जो बचेंगे। जैसे बाबा ने मुरली में बोला है- जब विनाश होगा तो आधे पुण्यआत्माएँ, आधा पापात्माएँ बचेंगे। विनाश होने बाद थोड़े बचते हैं। उनमें पुण्यात्मा भी रहते हैं। फिर हिसाब-किताब चुक्तू कर सतयुग में तो सब पावन होंगे। संगम पर कुछ पतित कुछ पावन रहते हैं, फिर पतित खलास हो फिर पावन ही पावन रहेंगे।(मु.7.6.64 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें

इसका मतलब जो पापात्माएँ बचेंगी उनको फिर पुरुषार्थ करना है। विनाश के बाद जो भी बचेंगे उनकी आत्माएँ परमधाम से वापस आयेंगी और अपने शरीरों में प्रवेश करेंगी। कोई प्रश्न कर सकता है- उनके शरीर कैसे बच जायेंगे? उसका हिसाब है कि जब कई दिनों तक मूसलाधार बरसात होगी तो दुनिया का वातावरण ठंडा हो जावेगा। चारों तरफ दुनिया में बर्फ-ही-बर्फ जम जावेगी और उस बर्फ में जो बीजरूप आत्माएँ याद की अवस्था में बहुत तीव्र हैं वो याद की स्टेज में अपना शरीर छोड़ देंगी। इसलिए उन योगियों के जो शरीर हैं वो ऐसे नैचुरल (प्राकृतिक) साधन बनेंगे कि वो बर्फ में दब जावेंगे। उनके शरीर कोल्ड स्टोरेज की तरह सुरक्षित रहेंगे और वो तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक परमधाम से उनके नम्बर पर उनकी आत्माएँ येन केन प्रकारेण उनके शरीर में प्रवेश न करें। इस तरह नयी सृष्टि की शुरुआत होगी। जो बीजरूप आत्माएँ हैं वो फिर से अंत मते सो गते की आत्मिक स्टेज में अपनी तपस्या शुरू करेंगी। उस समय शिवबाबा की याद नहीं होगी, ज्ञान नहीं रहेगा, सब ज्ञान भूल जावेगा।

आज की दुनिया में भी कभी कोई ऐसा एक्सिडेंट हो जाता है कि जिसके मस्तिष्क में अगर कोई ऐसी चोट लग जाए तो वो सारी पुरानी बातें भूल जाता है। वैसे ही वो भी पास्ट की बातें भूल जायेंगे। (किसी ने पूछा-मूसलाधार बरसात कितने दिन होगी?) मूसलधार बरसात तो थोड़े दिन होगी। अरे! 4 घंटे पानी लगातार बरस जाता है तो लोग त्राहि-त्राहि करने लग जाते हैं। वो तो सप्ताह-दो-सप्ताह की बात है; लेकिन जो वातावरण ठंडा हो जाएगा उसमें जो बर्फ जमेगी वो लम्बे समय तक जमी रहेगी। दुनिया के बहुत से इलाकों में तो वर्षों तक जमी रहेगी और उस बर्फ में उनके शरीर सुरक्षित रहेंगे। बहुतों के शरीर तब तक ऐसे रहेंगे जब तक राधा-कृष्ण जैसे बच्चों का जन्म होना शुरू नहीं होगा। आत्माएँ तो ऊपर से नीचे उतरती रहेंगी। पहले तो बीजरूप आत्माओं के शरीरों में आत्माओं का प्रवेश होगा। जो शरीर नीचे बर्फ में दबे पड़े हुए होंगे उनमें उन 4.5 लाख पक्की नंबरवार आत्मिक स्थिति वाली सोल्स का प्रवेश होगा। प्राकृतिक रूप से उस स्थान की बर्फ टाइम आने पर हटेगी और वो आत्माएँ विचरण करने लगेंगी। धीरे-धीरे सब अपने समान संस्कारों अनुसार इकट्ठे हो जाएँगे; क्योंकि ये बीजरूप आत्माएँ तो सारे विश्व के सब धर्मों के वैराइटी बीज हैं। कयामत के समय में यहाँ इसी आखिरी विनाश के पूर्व इनको सारी दुनिया में फैल जाना पड़ेगा। जो जिस धर्म खंड का या जो जिस धर्म की बीजरूप आत्मा होगी उसको उसी धर्म खंड में जाना पड़ेगा। मान लो कोई एकदम लेफ्टिस्ट धर्म का है, तो ज़रूर वो विपरीत बुद्धि बनने वाली बीजरूप आत्मा भी होगी। बाप से विपरीत बुद्धि भी ज़रूर बनेगी; क्योंकि वो बीजरूप आत्मा है। बीज में वो क्वालिटी होगी जो दूसरे धर्मों की क्वालिटी होती है। देह अभिमान का कड़ा छिलका ज़रूर चढ़ा हुआ होगा। तो वो आत्माएँ जो विपरीत बुद्धि बनती हैं उनके लिए कहते हैं सद्गुरु के निंदक ठौर ना पाए(मु.ता.2.2.68 पृ.1 मध्यांत)। मुरली प्रूफ देखें

ऐसी सद्गुरु की निंदा कराने वाले वो बीजरूप बाप के बच्चे ईश्वरीय सेवा करने के लिए कयामत के समय में दूर देशों में अनादि निश्चित ड्रामानुसार ही फेंके जाएँगे। जहाँ विनाश का तांडव नृत्य हो रहा होगा वहाँ रहकर भी अपनी श्रद्धा, भावना और परमात्मा के विश्वास के आधार पर वो आत्माएँ विदेशों में, विदेशी धर्म खंडों में सेवा करते हुए, संदेश देते हुए भी परमात्मा बाप की याद में रहेंगी और एहसास करेंगी, पश्चाताप करेंगी कि हमने पहचान कर, नज़दीक रहकर भी हम बाप की ग्लानि के निमित्त बन गए।

इस तरह पश्चाताप की अग्नि में बार-बार जलकर वो अपने सारे पापों को स्वाहा कर देंगी; लेकिन बाद में सारे विश्व में बिखरी हुई आत्माओं को इकट्ठा होने में टाइम तो ज़रूर लगेगा।

18 वर्ष का पीरियड संवत् (2018) के बाद से लेकर (2036) तक विशेष पुरूषार्थ और परिवर्तन का है। जैसे 18 वर्ष का पीरियड यहाँ भी महत्वपूर्ण है (सन् 51 से लेकर 68 तक- यह 18 वर्ष का पीरियड हुआ ना!) 69 में बाबा ने शरीर छोड़ा था, अव्यक्त हुए थे। तो यह व्यक्त-अव्यक्त पार्ट कितने साल चला? 18 अर्थात् सन 51 से 68 और 69 से 86 तक साल चला। तो जैसे यहाँ 18 वर्ष कार्यकाल चला वैसे 18 वर्ष वहाँ भी मन-बुद्धि रूपी सूक्ष्म आत्माओं के परिवर्तन के लिए नूँधे हुए हैं। यह 18 वर्ष ऑटोमैटिक भट्ठी चलेगी। ऑटोमैटिक का मतलब कोई खास प्रयत्न नहीं करना पड़ेगा; क्योंकि वहाँ चुनिन्दा ब्राह्मणों की दुनिया में ज्ञान का सब्जेक्ट समाप्त हुआ पड़ा होगा। सिर्फ़ योग का सब्जेक्ट रह जाएगा। ज्ञान का सब्जेक्ट खत्म। ज्ञान क्या है? परमात्मा का परिचय, आत्मा का परिचय, रचयिता और रचना का परिचय- वो ही ज्ञान है। वो समाप्त। योग माना आत्मिक स्टेज। अंत मते सो गते की स्टेज और उस समय सेवा करने की दरकार ही नहीं; क्योंकि विरोधी आत्माएँ ब्राह्मणों की नई दुनिया में होंगी ही नहीं जिनकी सेवा करें और धारणा करने का भी कोई विशेष पुरुषार्थ नहीं करना पड़ेगा। धारणा करने का पुरुषार्थ हमको तब तक करना पड़ रहा है जब तक दुनियावी विरोधी आत्माओं के संसर्ग-संपर्क और संग में हमको आना पड़ रहा है। हम बाप के ही संग में लगातार बने रहें तो दुनियावी लोगों का संग का रंग कैसे लगेगा? लेकिन जब तक ब्राह्मणों की पुरानी दुनिया का विनाश नहीं होगा तब तक आत्माओं का जो हुजूम है, उनका बनाया हुआ वातावरण है, वायुमण्डल है उसमें हमको संसर्ग-संपर्क में जाना पड़ेगा। तो वो वायुमण्डल वहाँ ब्राह्मणों की नई दुनिया में नहीं होगा। इसलिए धारणा करने की भी ज़रूरत नहीं, ऑटोमैटिक धारणा भी होगी। 18 वर्ष की योग भट्ठी में सबसे पहले जो युगल अपने अंतःवाहक शरीर रूपी काया को यानी सूक्ष्म पाँच तत्वों को कंचन बनाने में सफल होगा- वो हैं शंकर-पार्वती। वो ही राधा-कृष्ण जैसे बच्चों को सतयुग में जन्म देने के लिए निमित्त बनेंगे। इस तरह धीरे-धीरे क्रमशः एक्यूरेट सतयुग की शुरुआत हो जावेगी। पहले-पहले तो फर्स्‍ट जनरेशन के साढ़े चार लाख बच्चों को जन्म देना शुरू होगा। किनसे? उन्हीं नं0 वार 4.5 लाख बीजरूप आत्माओं से, जिन्होंने योगबल से अपनी सूक्ष्म और फिर सन् 36 के बाद स्थूल काया को नं0 वार कंचन बना दिया होगा। इस तरह 9 लाख आबादी से सतयुग की एक्यूरेट शुरुआत हो जाती है।

98 तक वैश्य वर्ण की आत्माओं की तमोप्रधान अवस्था भी पूरी हो जाती है। इसके बाद शूद्र वर्ण की आत्माओं की भी 4 अवस्थाएँ हैं जो 2000 से 2003/04 तक चलती है। उसके बाद विष्णु देवता की प्रैक्टिकल शूटिंग शुरू होती है। इस प्रकार ये 4 युगों की प्रैक्टिकल शूटिंग समाप्त होने पर सविशेष ब्राह्मणों की बुद्धि का परिवर्तन हो जाएगा। मन-बुद्धि रूपी आत्मा का परिवर्तन होने के बाद फिर सन् 2036 से शरीरों का परिवर्तन अर्थात् पाँच स्थूल तत्वों से बने शरीर का परिवर्तन शुरू होगा तब तक शरीर सड़ते जावेंगे और ब्राह्मणों की आत्माएँ पावरफुल होती जावेंगी।

इस सृष्टि-चक्र का एडवांस नॉलेज के आधार पर अगला प्रकरण है ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात। यह ब्रह्मा की रात-दिन कोई सतयुग-त्रेतायुग, द्वापरयुग-कलियुग चार युगों की बात नहीं है। 5000 वर्ष के ड्रामा की बात नहीं है; क्योंकि सतयुग-त्रेता के 2500 वर्षों में न ब्रह्मा होता है, न ब्राह्मण होते हैं जो वहाँ ब्रह्मा का दिन हो या रात हो। इसी तरह द्वापर-कलियुग में भी 2500 वर्ष ब्रह्मा की रात्रि नहीं कही जा सकती। वहाँ भी ब्रह्मा और ब्राह्मण नहीं होते। ये तो वास्तव में पुरुषोत्तम संगमयुग के चार युगों की शूटिंग पीरियड की बात है। हर युग की शूटिंग में चार अवस्थाएँ समाई होने से सतोप्रधान व सतोसामान्य अवस्था का टाइम ही ब्रह्मा का दिन है। जबकि ज्ञान सूर्य किसी साकार के तन में प्रत्यक्ष होता है और जब द्वापर-कलियुगी शूटिंग में गुप्त हो जाता है तो ब्रह्मा की रात कही जाती है।

ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात- दोनों इक्वल होता है ना! फिर सतयुग दिन की इतनी बड़ी आयु और रात को छोटा क्यों कर दिया है? ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात, दोनों इक्वल होनी चाहिए ना। (मु.22.9.77 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें

ब्रह्मा की रात सो सरस्वती की रात, ब्रह्मावंशियों की भी रात। दिन में फिर सभी ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। (मु.27.7.73पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें

बरोबर परमपिता परमात्मा ब्रह्मा की रात को ब्रह्मा का दिन बनाने आता है। (मु.20.10.73 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें

जैसे 69 से पहले सतयुगी शूटिंग कार्यकाल में ज्ञानसूर्य ब्रह्मा के तन में प्रत्यक्ष था तो ब्रह्मा का दिन था और उसके बाद साकार तन समाप्त होने से ब्रह्मा की रात हो गई; क्योंकि ज्ञानसूर्य आँखों से ओझल हो गया। तो ब्राह्मणों की दुनिया में अनेक देहधारी धर्मगुरुओं का शासन शुरू होने से अंधेरा हो गया। अंधेरे में सब लतसंग की ठोकरें खाते हैं। एक-दूसरे को लात मारते रहते हैं; क्योंकि देहधारी धर्मगुरु ही अंधकार करते हैं और एक ज्ञानसूर्य ही सोझरा करते हैं।

इसी तरह 76 से 83 तक त्रेता की शूटिंग में ब्रह्मा का दिन एडवान्स पार्टी के बीच दिल्ली में हुआ। जिन ब्राह्मणों के बीच ज्ञानसूर्य प्रत्यक्ष होता है वही आत्माएँ सन् 83 तक आते-2 ज्ञानसूर्य के गुप्त होने से ब्रह्मा की रात्रि (में) आ गई। 88/89 तक राम अवतार की प्रत्यक्षता होने तक ये रात्रि चलती रही।

उसी समय से एडवांस ब्राह्मणों की दुनिया में द्वापरयुग की सतोप्रधान-सतोसामान्य स्टेज होने के कारण ब्रह्मा के दिन की शूटिंग होती है। 95/96 की द्वापरयुगी शूटिंग में रजोप्रधानता आने से पुनः ज्ञानसूर्य बाप देहधारी धर्मगुरुओं द्वारा गुप्त किया जाता है। तो फिर से ब्रह्मा की रात्रि शुरू हो जाती है।

इसी तरह कलियुगी शूटिंग में सतोप्रधान-सतोसामान्य अवस्था 2000/2001 का पीरियड ब्रह्मा का दिन और फिर 2002/2003 अंतिम वर्ष समय ब्रह्मा की रात की शूटिंग नूँधी हुई है।

ऐसे ही व्यक्तिगत रूप से जिन्हें साकार ईश्वरीय पार्ट पर जब तक निश्चय है तब तक उनके लिए ब्रह्मा का दिन है और जब निश्चय टूटता है तो ब्रह्मा की रात की शूटिंग कही जाएगी। इसीलिए 9/1/95 की अव्यक्त वाणी में कहा है कि- चारों प्रकार का निश्चय अर्थात् बाप में, आप में, ड्रामा में और ब्राह्मण परिवार में निश्चय। ये चार ही तरफ के निश्चय को जानना नहीं; लेकिन मानकर चलना। अगर जानते हैं; लेकिन चलते नहीं हैं तो विजय डगमग होती है। मुरली प्रूफ देखें

हमारा तो विद्यालय है ना। इस सृष्टि चक्र में 4/5 चित्रों को सामने रखते हुए विचार-सागर-मंथन करें तो एडवान्स नॉलेज का विस्तार स्वतः ही हमारे अंतःकरण में होता रहेगा। जैसे बाबा बोलते हैं- बच्चे, इन चित्रों के सामने अमृतवेले बैठ जाओ, स्वदर्शन चक्र घुमाओ तो बाबा और ब्राह्मणों ने समझ लिया सतयुग-त्रेता-द्वापर-कलियुग, फिर संगमयुग यह हो गया स्वदर्शन चक्र। बाबा का ये मतलब नहीं था। ये तो रट्टू तोते वाली बात हुई। अभी भी कोई-2 पूछते हैं स्वदर्शन चक्र कैसे घुमाया जाता है? ये बार-2 पूछने की बात नहीं है। जो बाबा का डाइरैक्शन है वो फालो करना है। जैसे कोई ड्रामा होता है तो उसकी रिहर्सल, रिकॉर्डिंग की जाती है। रिकॉर्डिंग का राज़ क्या है? 5000 वर्ष की सृष्टि में जिस मनुष्य आत्मा ने भी जो पार्ट बजाया है वो सुदर्शन चक्र घुमाने से क्लीयर होता है। हर आत्मा अपना-2 मनन-चिंतन-मंथन करके अपने-2 84 जन्मों का पार्ट खोल सकती है। ये ज्ञान का ऐसा प्रोसीजर दिया है कि जो भी मनन-चिंतन-मंथन करेगा वो अपने 84 जन्मों को जान सकता है। बाबा ने 7.8.67 की मुरली में बोला कि याद की यात्रा से और सृष्टि की आदि मध्‍य अंत को जानने से हम चक्रवर्ती राजा बन जावेंगे।मुरली प्रूफ देखें

कौन-सा चक्र? स्वदर्शन चक्र। स्वमाना आत्मा, दर्शनमाना देखना, कैसा चक्र? 84 का चक्र। अपनी आत्मा का 84 के चक्र में क्या-2 पार्ट है वो देखना। वो तुम अभी जान सकते हो। इसके लिए याद की यात्रा बहुत ज़रूरी है। स्वदर्शन चक्र तीव्र रूप से खुलता रहे, फिरता रहे इसके लिए याद की यात्रा बहुत ज़रूरी है। किसकी याद ? बाप की याद। बाप रामवाली आत्मा आलराउन्ड पार्टधारी है, हीरो पार्टधारी है। खुद उसकी रहबरी में हम भी स्वदर्शन चक्र घुमाने की परिक्रिया सीखेंगे तो हम भी पूरे 84 चक्र को लगाने वाले आलराउन्ड पार्ट बजाने वाले बच्चे बनेंगे। यूँ तो रियलायजशन कोर्स है, एडवान्स नॉलेज है। वो कोर्स लेने के बाद जो विशेष आत्माएँ हैं, जो राम-कृष्ण वाली आत्माओं के साथ संसर्ग-सम्पर्क में अनेक जन्मों तक आई हैं उनमें वो संग के रंग के मनन-चिन्तन के अनेक जन्मों के संस्कार ऑटोमैटिक भरे हुए हैं। उनको विशेष मेहनत करनी ही नहीं पड़ेगी। स्वतः ही उनका स्वदर्शन चक्र घूमने का पुरुषार्थ चलता रहता है और नम्बरवार उनके पार्ट खुलते भी जा रहे हैं और आगे चलकर खुलते भी रहेंगे।

ड्रामा के एक्टर्स होते हुए भी ड्रामा के मुख्य एक्टर्स, डायरैक्टर, क्रियेटर और ड्रामा के आदि, मध्य, अंत को नहीं जानते हैं तो वह बेसमझ हैं। इसे लिखने में भी कोई हर्जा नहीं है। (मु.14.8.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें

दुर्गति से निकाल सदगति बाप ही देते हैं। वही क्रियेटर ,डायरैक्टर ,मुख्य एक्टर गाया जाता है। मुख्य एक्टर कैसे है? पतित-पावन बाप आकर पतित दुनिया में सभी को पावन बनाते हैं। तो मुख्य हुआ ना। (मु.17.6.72 पृ.2अंत) मुरली प्रूफ देखें

जब पूरा दुर्गति को पाने का पूरा ग्रहण लगे तब बाप फिर 16 कला सम्पूर्ण बनाने आते हैं। ग्रहण को स्वदर्शनचक्र से निकाला जाता है। (मु.27.11.77 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें

अंत में ये बात आती है कि सृष्टिचक्र में दोनों सूइयों का गैप 100 साल का संगम बताता है। जैसे घड़ी में 3 सूइयाँ होती हैं वैसे ये भी सृष्टि रूपी घड़ी है। इसमें दो सूइयाँ दिखाई हैं गई। एक सूई गुप्त है। इस सारी सृष्टिचक्र में मुख्य कार्यकर्ता कितने हैं? तीन। ये ब्रह्मा,विष्णु,शंकर तीन कार्यकर्ता ही तीन सूईयाँ हैं। घण्टे की सूई घण्टे-घण्टे में चलती है। मिनट की सूई मिनट-मिनट में चलती है। सेकेण्ड की सूई सेकेण्ड-सेकेण्ड दौड़ती है। तीनों सूइयाँ सेवा के चक्कर भी काटती हैं। बाबा कहते हैं- सेवा के चक्कर लगायेंगे तो चक्रवर्ती राजा बनेंगे। जो सेवा के सबसे जास्ती चक्कर काटेंगे, वो उतने बड़े राजा बनेंगे। ईश्वरीय सेवा में तन-मन-धन से चक्कर काटो तो चक्रवर्ती राजा बनेंगे। खूब सुदर्शन चक्कर घुमाओ। तो तीव्र पुरुषार्थी कौन-सी सुई है? जिनको एक-एक सेकेण्ड बाप की याद आती है और घड़ी-घडी जो सेवा के चक्कर काटती है वो है सेकेण्ड वाली सुई। सेकेण्ड बाइ सेकेण्ड जिसे बाप की याद है वो याद में बैठा हुआ चित्रों में दिखाया जाने वाला बाप जगतपिता भी है। उससे मध्यम सुई है लम्बी वाली सुई। वो है वैष्णव देवी। और जो बहुत धीरे-धीरे चलती है वो है घण्टे वाली सुई। एक 84 घण्टे की देवी सुनी है? तो जो घण्टे वाली सुई है वो है जगतमाता अर्थात् ब्रह्मा।

स्थापना का कार्य सम्पन्न होना अर्थात् विनाशकारियों को ऑर्डर मिलना है। जैसे समय समीप अर्थात् पूरा होने पर सुई आती है और घंटे स्वतः ही बजते हैं, ऐसे बेहद की घड़ी में स्थापना की सम्पन्नता अर्थात् समय पर सुई (कांटा) का आना और विनाश के घंटे बजना। तो बताओ, सम्पन्नता में एवररेडी हो? (अ.वा.1.1.79 पृ.164 आदि) मुरली प्रूफ देखें

अच्छा, ओमशान्ति।