बीकेज़ और पी.बीकेज़ में अंतर
1. ब्रह्माकुमारी विद्यालय शास्त्रों को मान्यता नहीं देता है।
* आध्यात्मिक विश्व विद्यालय ब्रह्मा द्वारा चलाई गई शिव की मुरलियों के आधार पर शास्त्रों को मान्यता देता है।
2. ब्रह्माकुमारियाँ:- सिर्फ ब्रह्मा को ही भगवान का साकार रूप मानती हैं। शिव बाप साकार ब्रह्मा द्वारा जो वाणी चलाते,वह हुई मुरली। यह वेदवाक्य पत्थर की लकीर है। अव्यक्त ब्रह्मा बाबा गुलज़ार दादी द्वारा जो वाणी चलाते वह है - अव्यक्त वाणी। यह ब्रह्मा की दैवी गुणों की वाणी है, ईश्वरीय ज्ञान की वाणी नहीं।
*आ.वि.- शिवबाबा के एडवांस ज्ञान द्वारा सुप्रीम टीचर की मुरली और अव्यक्त वाणी की व्याख्या निकल रही है।
3.ब्र.वि.:- सिर्फ ब्रह्मा (ब्रह्मा+माँ) बड़ी माँ को ही भगवान का साकार रूप मानता है और उसके सदस्य अपने को सिर्फ ब्रह्माकुमार-कुमारी (बी. केज़) कहलाते हैं।
*आ.वि.- माँ और बाप (प्रजापिता+ब्रह्मा = एडम और ईव) दोनों को साकार रूप में मानता है और उसके सदस्य अपने को प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारी (पीबीकेज़) कहलाते हैं।
4. बीकेज़ ने ब्रह्मा द्वारा शिव की (चलाई हुई) मुरलियों का विरोध करते हुए ब्रह्मा बाबा की गैर जानकारी में ही संस्था का रजिस्ट्रेशन ” वर्ल्‍ड रिन्युअल ट्रस्ट“ के नाम से करा लिया।
 मु.में आया है- ”बाप तो कहते हैं मैं बिल्कुल साधारण हूँ। तो साहूकार कोई विरले आते हैं।... फिर भी यह बड़ी पाण्डव गवर्मेन्ट है। यह शूद्र गवर्मेन्ट पास अपन को रजिस्टर करावे ऐसे हो नहीं सकता। बाबा कहते हैं हम तो शिव भोला भण्डारी हैं। हमको यह कंगाल गवर्मेन्ट क्या मदद करेगी! हम तो इस गवर्मेन्ट को कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं। तो ऐसे ठिक्कर गवर्मेन्ट के पास अपन को रजिस्टर कराना शोभता नहीं। कौरवों के अन्डर पाण्डव गवर्मेन्ट कैसे रह सकती! नशा रहना चाहिए। उन्हों को समझाना हम भारत की तन-मन-धन से सेवा करते हैं।“ (मु.21.1.73 पृ.2 अंत) प्रूफ देखें
*पीबीकेज़ ने हर प्रकार के सामाजिक, आयकर विभागादि और गवर्मेन्ट के अधिकारियों के दबाव देने के बावजूद भी भगवान की श्रीमत पर अड़े रह कर एडवांस ब्राह्मण परिवार को रजिस्टर्ड नहीं कराया।
5. ब्र.वि.- ब्रह्माकुमारियाँ कहती तो हैं, ‘परमात्मा शिव’ सर्वव्यापी नहीं है; परन्तु उन्हें पता ही नहीं ‘एकव्यापी’ है कहाँ?
*आ.वि.- भगवान बाप के बच्चों को एडवांस नॉलेज से पता है कि निराकार शिव ही मूर्तरूप शंकर के माथे पर शिवनेत्र के रूप में विराजमान है। इसीलिए भगवान ‘शिव’ एक मात्र शंकर महादेव में ही व्यापी है; सर्वव्यापी नहीं। इसीलिए एकमात्र शंकर देवता का नाम ही शिव भगवान से जोड़ा जाता है।
6. ब्र.वि. :- शिवबाबा ब्रह्मा मुख से कहते हैं- ”माँगने से मरना भला“। ब्रह्माकुमारियाँ कहती हैं कि माँगने सिवाय हमारा ईश्वरीय धंधा कैसे चले? ब्रह्माकुमारीज़ एक आध्यात्मिक संस्था है, जिसे चलाने के लिए दान माँगना पड़ता है। जबकि ‘अधि’ माना अंदर अर्थात् आत्मा के अन्दर की बात तो परमात्मा ही जानता है। ब्र.वि. में ब्र.कु.कुमारियों के अलावा, जनरल पब्लिक से भी चंदा माँगकर व्यक्तिगत वैभव और मान-शान बढ़ाना आम बात है। जब कि 13.6.84, पृ.3 की मुरली में शिवबाबा ने बोला है-
 ”तुम बतलाते हो हम अपने ही खर्चे से अपने लिए सब कुछ करते हैं। दूसरों के खर्चे से कैसे बनायेंगे? इसलिए बाबा हमेशा कहते हैं- माँगने से मरना भला। सहज मिले सो दूध बराबर.... माँग लिया सो पानी।“ प्रूफ देखें
*आ.वि. में कोई भी प्रकार का दान किसी भी रूप में माँगा नहीं जाता। हमारा तो ईश्वरीय परिवार है। घर चलाना भगवान बाप का काम है। माँगने की क्या दरकार? ईश्वरीय मत पर चलने से स्वतः ही सब बातों की पूर्ति होती है- योगक्षेमं वहाम्यहम् (गीता 9/22)। हमारा तो ईश्वरीय परिवार है। परिवार के सदस्य अपने तन, मन, धन से ईश्वरीय मत पर चलकर अपने लिए विश्व की बादशाही स्थापन करते हैं। चंदा या भीख माँगकर भक्ति करना तो अज्ञानी भक्तों का काम है। आ.वि. में जनरल पब्लिक से तो क्या, अपने परिवार के नॉन सरेंडर्ड भाई- बहनों से भी किसी प्रकार का चंदा आदि ‘माँगने से मरना भला’ समझता है।
7. 7. बीकेज़ में ब्रह्मा बाबा के मुख से निकले ब्रह्म ज्ञान के अनुसार गीता की टीका क्यों नहीं बनाई जा रही है? जबकि दुनिया के सभी ढेर-के-ढेर सम्प्रदायों में अपने-2 मत के अनुसार गीता की टीका बनाई है।
* पीबीकेज़ में एडवांस ज्ञान के साथ-साथ ब्रह्मा की वेद वाणी अनुसार गीता की टीका तैयार हो चुकी है, जो शिवबाबा की मुरलियों और अव्यक्त-वाणियों के अनुसार फिट बैठती है।
8. अभी ब्रह्माकुमारियाँ राजयोग की पढ़ाई डायरैक्ट भगवान बाप के सम्मुख नहीं सुनतीं। वो कागज़ की मुरली पढ़ती हैं और समझाती हैं। वो सिर्फ भगवान का माता रूप स्वर्गीय ब्रह्मा की कागज़ की मुरली को अपने तरीके से समझती और समझाती हैं, सुप्रीम टीचर से नहीं।
* पीबीकेज़ भगवान बाप के एडवांस ज्ञान को पहचान कर सम्मुख बैठ फर्स्‍ट क्‍लास मुरली सुनते हैं। जबकि शिवबाबा ने टेप रेकॉर्ड को सेकिंड क्लास और कागज़ की मुरली को थर्ड क्लास बताया है।
”सम्मुख सुनना है नं.वन, टेप से सुनना है नं.टू, मुरली से पढ़ना नम्बर थ्री।“(थर्ड ग्रेड मुरली) (मु.27.1.73 पृ.3 अंत) प्रूफ देखें
9. बीकेज़ कागज़ की मुरली में काट-छाँट, एडीशन और एडल्ट्रेशन करते हैं, जिसका प्रमाण एडवांस में मुरली खंड 1 और 2 में विस्तार से प्रूफ सहित दिया गया है।
 बाबा, हमें टूटी-फूटी रत्न भेज देते हैं। बहुत कट करते हैं। हमारे रत्नों की चोरी हो जाती है। बाबा, हम अधिकारी हैं, जो रत्न मुख से निकलते हैं वह सभी हमारे पास आना चाहिए। (मु. 10.3.72 पृ.2 अंत) मु. 29.3.02 पृ.3 मध्‍य प्रूफ देखें
* आ.वि. में शिवबाबा के (चलाए गए) प्रमाणिक ऑडियो, वी.सी.डी. की मुरलियों /अ.वा. में काट-छाँट का सवाल ही पैदा नहीं होता।
10. ब्र.वि. कृष्ण उर्फ ब्रह्मा को ही एकमात्र गीता का साकार भगवान मानता है, जबकि मुख से कहता है कि कृष्ण गीता का भगवान नहीं है।
*आ.वि. निराकारी स्टेज वाले मूर्तरूप शिव-शंकर को प्रैक्टिकल में गीता का भगवान मानता है, कृष्ण उर्फ ब्रह्मा के साकार रूप दादा लेखराज को गीता का भगवान नहीं मानता।
11. बीकेज़ः- शास्त्रों और भक्तिमार्ग में ब्रह्मा के यादगार मन्दिर, मूर्तियाँ और पूजा क्यों नहीं दिखाई, शंकर और विष्णु के यादगार मन्दिर, मूर्तियाँ और पूजा क्यों होती है, इसका जवाब बीकेज़ के पास नहीं है।
* पीबीकेज़ में शास्त्रों में ब्रह्मा की पूजा न होने और विष्णु और शंकर के पूजनीय होने का सटीक जवाब मिलता है।
12. ब्र.वि.- ब्रह्मा-विष्णु-शंकर के साकार चित्र तो छपाता है; परंतु सिर्फ ब्रह्मा के प्रैक्टिकल साकार रूप को ही मान्यता देता है, विष्णु और शंकर को इस दुनिया से ही उड़ा देता है। जबकि शास्त्रोंव दुनिया में भी ब्रह्मा के मंदिर, मूर्तियाँ और पूजा नहीं दिखाई है। ब्रह्माकुमारी विद्यालय शिव-शंकर को अलग-2 तो कहता है; लेकिन यह नहीं बताता कि शास्त्रों में शिव-शंकर को क्यों मिला दिया? शिव को ब्रह्मा, विष्णु अथवा अन्यान्य 33 करोड़ देवताओं के साथ क्यों नहीं मिलाया और शंकर को ही महादेव क्यों कहा है?
*आ.वि. में उपरोक्त प्रश्नों का सटीक जवाब है और तीनों देवताओं के साकार प्रैक्टिकल पार्ट की स्पष्टता भी है।
13.ब्र.वि.- ज्ञान-योग का विज्ञापन करता है; जैसे- प्रोजेक्टर, प्रदर्शनी, पब्लिक भाषण, कॉन्फ्रेंस, मेले, सम्मेलन, रथयात्रा, मनुष्यकृत साहित्य आदि...।
* आ.वि.- किसी प्रकार के विज्ञापन में विश्वास नहीं करता।
14. ब्र.वि.- सिर्फ मृत्यु के बाद ही मुक्ति-जीवनमुक्ति रूपी ईश्वरीय वर्से को जीवन का लक्ष्य मानता है।
*आ.वि.- जीवन रहते ही लोक और परलोक सँवारने का पुरुषार्थ कराता है अर्थात् इसी जन्म में नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनाने का परम प्रसिद्ध गीता वर्णित उपदेश देता है।
15. ब्र.वि. सिर्फ कहता है कि हम एक मत की स्थापना करेंगे; परंतु चलन में दीदी, दादी, दादाओं की मनमत का पूरा ही विरोधाभास देखने में आता है। ब्र.वि. से ही आए हुए 80 से भी अधिक आध्यात्मिक विद्यालय के सदस्य इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
*आ.वि. के सदस्य प्रैक्टिकल में आए हुए एकमात्र ईश्वर की ही श्रेष्ठ मत को मानते हुए, ईश्वरीय धारणाओं, कायदे, कानून को मानने के साथ-2, नम्बरवार अपने-2 पुरुषार्थ अनुसार चलने का प्रयास भी करते हैं।
16. ब्र.वि.- समर्पित ब्र.कुमारियाँ प्रायः संन्यासियों की तरह मठ-पंथ बनाकर जीवन चलाती हैं।
*आ.वि. के समर्पित या गैर समर्पित सभी सदस्य गृहस्थी जीवन यापन करते हैं; क्योंकि गीता के भगवान स्वयं बेहद के गृहस्थ जीवन में रहते हुए गृहस्थी पाण्डवों को ही राजयोग सिखाते हैं, भीष्म पितामह जैसे संन्यासियों को नहीं।
17.ब्र.वि. प्रायः करके कन्याओं को समर्पित कराने में लाखों रुपयों का दहेज लेकर ही समर्पित कराते हैं। भूतकालीन 2500 वर्ष के भक्तिमार्ग की दहेज लेने की परम्परा इन्ही ब्र.कु. द्वारा चलाई जाती है।
*आ.वि. में कन्याओं को ईश्वरीय ज्ञान, सेवा के प्रति समर्पित कराने में दहेज आदि लेने का कोई प्रावधान नहीं है।
18.ब्र.वि. दीदी, दादी, दादाओं को ही गुरु मानकर बैठे हैं और उनके डायरैक्शन पर चल पड़े हैं। ब्रह्मा द्वारा चलाई गई शिवबाबा की मुरलियों को कोई खास मान्यता नहीं देते हैं। सिर्फ शास्त्रों की तरह मुरलियों का क्लास में पाठ करते हैं। मुरली के एक-एक शब्द और महावाक्यों का मनन-चिंतन-मंथन करके सार स्वरूप मक्खन नहीं निकालते।
 ब्रह्मा द्वारा मुरली में बोला भी है - ‘‘(ब्रह्मा बाबा के जीवित रहने तक) गीता... ज्ञानामृत भी नहीं कह सकते हैं।“ ”गीता को ज्ञानामृत कहना भी राँग है। भल बाबा ने इतने दिन नहीं कहा।“ (मु.6.3.67 पृ.2 मध्य) प्रूफ देखें
*आ.वि. में दादा लेखराज ब्रह्मा में शिवबाबा को गुरु मानते हैं, और कोई देहधारी को गुरु न मानकर ब्रह्मा द्वारा चलाई गई शिवबाबा की मुरलियों और गुल्ज़ार दादी द्वारा चलाई ब्रह्मा की अ.वाणी को ही मान्यता देता है।
19. ब्र.वि. के सदस्य दीदी, दादी, दादाओं को ही गुरु मानकर उनके स्मृति दिवस मनाते हैं।
*आ.वि. के सदस्य किसी भी व्यक्ति विशेष को गुरु मानकर स्मृति दिवस आदि नहीं मनाते हैं।
20. ब्र.वि. भक्तिमार्ग के अंध-श्रद्धायुक्त- शिवरात्रि, रक्षा-बंधन, दशहरा, दीपावली आदि त्योहारों को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। जबकि शिवबाबा की मुरलियों में
‘‘भक्तिमार्ग मुर्दाबाद; ज्ञानमार्ग जिंदाबाद होता है।’’ (मु.21.4.68 पृ.3 मध्य) प्रूफ देखें
*आ.वि. भक्तिमार्ग के कोई प्रकार के टंट-घंट, शोर-शराबा आदि नहीं करता है।
21. ब्र.वि. के सदस्य कहते हैं कि सतयुगी नई दुनिया, रामराज्य हम लाएँगे। अर्थात हम ही कुरु की अहंकारी औलाद कौरव है। ब्र.कुमारी दादियाँ अपने त्रिमूर्ति शिव के प्रैक्टिकल रूप में पोस्टर भी छपाती हैं।
*आ.वि. के सदस्य कहते हैं 2500 वर्ष की हिस्ट्री भी कहती है कि आजतक कोई भी देहधारी धर्मगुरु या धर्मपिता नई दुनिया, स्वर्ग या रामराज्य नहीं ला सका। रामराज्य तो राम वाली देवात्मा के द्वारा एक ही भगवान शिवबाबा ला सकते हैं।
22. बीकेज़ लोगों को कहती हैं
‘‘जिसने थोड़ा भी ज्ञान सुना तो प्रजा में आ जावेंगे।’’ (मु.12.6.70 पृ.3 अंत) प्रूफ देखें
ब्रह्माकुमारी संस्था मेले-मलाखड़े, रथयात्रा, कॉन्फ्रेन्स, प्रदर्शनी आदि द्वारा विज्ञापन कर अच्छा संदेश मात्र देकर स्वर्ग की प्रजा बना रही हैं। प्रजा आधीन होती है। शिवबाबा तो एक-2 को व्यक्तिगत राजयोग सिखाकर राजा बनाने आए हैं। बाकी तो कम नॉलेज लेने वाले, सिर्फ संदेश लेने वाली प्रजा बन जाते।
* पीबीकेज़ को तो श्रीमत अनुसार शिवबाबा की नॉलेज एक-एक को बैठ समझानी पड़ती है। मु.8.9.69 पृ.3 आदि में बोला है-
”कोई भी आवे तो अलग-2 बिठा कर समझाओ नहीं तो कोई कौआ होगा तो काँयकाँय बैठ करेगा।“ प्रूफ देखें
एडवांस पार्टी (पीबीकेज़) किसी प्रकार के विज्ञापन में विश्वास ही नहीं करते। पूरा नॉलेज लेकर पूरा अभ्यास करने वाले नंबरवार (108) राजे, महाराजे (8) बनेंगे। या तो राजपरिवार (16,108) में आएँगे। ये सब प्रिंस-प्रिंसेज बनने वाले शिव के परिवार की माला है।
23. ब्रह्माकुमारी संस्था समझती है इस जन्म में ब्रह्मा बाबा श्याम (पतित) थे, अगले जन्म में स्वर्ग में जाकर सुंदर कृष्ण बनते हैं। इसलिए सतयुगी कृष्ण को भक्तिमार्ग में श्याम-सुंदर कहते हैं।
*आ.वि.- शिवबाबा कहते हैं- ”प्रजापिता ब्रह्मा पहले श्याम होता है, वही तीव्र पुरुषार्थ कर इसी जन्म में पावन अर्थात् सुंदर बनता है। इसलिए संगमयुगी कृष्ण को ज्ञानमार्ग में श्यामसुंदर कहते हैं। भक्तिमार्ग में भी श्यामसुंदर कहते हैं। एक व्यक्ति के ही दो नाम इकट्ठे कर दिए हैं। बाकी ऐसे नहीं कि इस जन्म में श्याम और अगले जन्म में सुंदर, ऐसे दो व्यक्तियों को श्याम-सुंदर नहीं कहा जाता।“
24.बीकेज़ का ब्रह्मा माँ के द्वारा बेसिक पढ़ाई का लक्ष्य अधूरा है; क्योंकि वे इस जन्म में राजयोग की पढ़ाई की प्राप्ति अगले जन्म में देवता बनना बताते और सिखाते हैं।
*पीबीकेज़ एडवांस ज्ञान द्वारा इसी जन्म में नर रूप में पढ़ना और इसी जन्म में पुरुषार्थ पूरा होने पर नर से नारायण बनने की प्रैक्टिकल बात बताते हैं। ऐसे थोड़े ही होता है कि डॉक्टरी, इंजीनियरिंग या वकील की पढ़ाई यहाँ पढ़ेंगे और अगले जन्म में डॉक्टर, इंजीनियर या वकील बनेंगे। ऐसी बेतुकी पढ़ाई पढ़ने और पढ़ाने वालों को अंधश्रद्धालु भक्त ही कहेंगे।
25. बीकेज़ में शिव की सोल ब्रह्मा की आत्मा द्वारा हीरोइन का पार्ट बजाती है जिसे वे ब्र.कु. दुनिया का हीर¨ भी समझते हैं।
*पीबीकेज़:- एडवांस में त्वमेव माता च पिता के अनुसार मस्तक में ज्ञान चंद्रमा ब्रह्मा माता और शिवपिता के कम्बाइण्ड पार्टधारी शंकर के अर्धनारीश्वर रूप को माता-पिता दोनों मानते हैं। इसी एक व्यक्तित्व को कहा जाता है- ”त्वमेव माता च पिता त्वमेव“
26. बीकेज़ शिव का नाम सिर्फ ब्रह्मा के साथ ही साकार में जोड़ना चाहते हैं। जबकि विष्णु और शंकर को एकदम उड़ा देते हैं और कहते हैं कि शास्त्रों आदि में विष्णु और शंकर की कोई बायोग्राफी नहीं है।
*पीबीकेज़:- एडवांस में ब्र.वि.शं./महादेव - इन तीनों की जीवन कहानी विस्तार में बताई जाती है। जो गीता और शास्त्रोंसे भी टैली होती है। यहाँ तक कि 33 करोड़ देवताओं में से शिव के साथ सिर्फ शंकर का ही नाम जोड़ा जाता है, और किसी देवता, मनुष्य या राक्षस का नहीं।
27. बीकेज़ में गांधी की तरह शरीर छोड़ने के कारण ब्रह्मा का भी नर्क से स्वर्ग, रावण राज्य से सूर्यवंशी रामराज्य लाने का सपना पूरा नहीं हो सका। सिर्फ मिलावटी कम कुरियों वाले कन्वर्टिड ब्राह्मण धर्म की स्थापना करके चले गए।
*पीबीकेज़:- एडवांस में बताते हैं कि इसी पुरुषार्थी जीवन में विश्वविजयी होने के कारण ‘काशी विश्वनाथ गंगे’ के साथ ‘सत्यनारायण की कथा’ और सतयुग आदि के ‘सत्यमेव जयते’ का यादगार चला आ रहा है और तिरंगे झंडे में तीन शरीर रूपी वस्त्रों की यादगार लाल, सफेद और हरा वस्त्र दिखाते हैं और गाते हैं- विजयी विश्व तिरंगा प्यारा। बाकी कपड़े का झण्डा कोई विश्व विजय नहीं कर सकता। और न ही हिंसा के आधार पर कोई भी हिटलर, नेपोलियन आदि विश्वविजय कर सके।
28.बीकेज़ कम्बाइंड रूपधारी ‘बापदादा’ शब्द का उच्चारण तो करते हैं; परंतु यह नहीं बताते कि कम्बाइंड बापदादा कौन है और कहाँ पार्ट बजाते हैं; क्योंकि
‘‘सूक्ष्मवतनवासी सम्पूर्ण ब्रह्मा में नहीं आते हैं।’’ (मु.5.11.92 पृ.1आदि) प्रूफ देखें
*पीबीकेज़ में मस्तक में ज्ञान चंद्रमा को धारण करने वाले शंकर के अर्धनारीश्वर स्वरूप में मनुष्य सृष्टि का पहला पत्ता कृष्ण उर्फ दादा लेखराज ब्रह्मा को बड़ा भाई और जगतपिता शंकर, दोनों के कम्बाइंड प्रैक्टिकल पार्ट को ”बापदादा“ मानते हैं और समझाते भी हैं।
29.ब्र.कुमारियाँ विनाशकारी शंकर को नहीं मानतीं। कहती हैं कि स्थूल बॉम्ब बनाने वाले वैज्ञानिकों की तरह हम ही ज्ञान बॉम्बों से सारी दुनिया का विनाश करेंगे।
*पीबीकेज़ कहते हैं कि शंकर के मस्तक में प्रवेश किया अधूरा ज्ञान चंद्रमा ब्रह्मा ही चंद्रभालिका महाकाली को प्रेरणा देकर आसुरी ब्राह्मणों की दुनिया का विनाश कराते हैं। कहावत भी है- नीम हकीमे खतरे जान।
30. बीकेज़ शिव-शंकर के प्रैक्टिकल साकार पार्ट को एकदम उड़ा देती हैं और सच्चे सद्गुरू को छोड़ अपनी ही मनमत पर विधर्मी धर्मपिताओं की तरह निराकार भगवान की मान्यता पर चल पड़ी हैं।
*जबकि पीबीकेज़ शिव की ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा द्वारा चलाई हुई मुरलियों और गुलज़ार दादी के द्वारा चलाई हुई अव्यक्त वाणियों के तारीख वाइज़ प्रूफ देकर सिद्ध कर रहे हैं कि दुनिया में कहीं-न-कहीं शिव-शंकर का बापदादा के रूप में प्रैक्टिकल साकार पार्ट चल रहा है। (देखिए सच्ची गीता पॉकेट)
31.बीकेज़ अति सूक्ष्म ज्योतिबिंदुशिव के इम्प्रैक्टिकल रूप को ही भगवान मानकर विधर्मी धर्मपिताओं की तरह निराकार भगवान की अंधश्रद्धा युक्त याद करने-कराने में विश्वास करती हैं।
*पीबीकेज़ का कहना है कि शिव की तरह सभी मनुष्यात्माएँ निराकार ज्योतिबिंदु ही है, तो कैसे माना जाए कि वही एक पर्टिक्युलर ज्योतिबिंदु शिव भगवान है? निराकार बिंदु आत्मा किसी मुकर्रर साकार तन की भृकुटि में तीसरे शिव नेत्र के रूप में प्रवेश करके नर्क की दुनिया के बीच प्रैक्टिकल स्वर्ग बनाकर दिखाए तभी हैविनली गॉड फादर कहा जाए; क्योंकि सदा स्व आत्मा की स्थिति में रहने वाला सदाशिव ही स्वर्ग स्थापन कर सकता है। कोई देहधारी धर्मपिता- इब्राहीम, क्राइस्ट आदि या उनके आधारमूर्तों ने 2500 वर्ष की हिस्ट्री में कभी स्वर्ग नहीं बनाया, दुनिया और ही दुखदायी नर्क बनती गई; क्योंकि नर तो नर्क ही बनाएगा ना। सदा ही स्वस्थिति में रहने वाला सदाशिव ही स्वर्ग बनाएगा।
32. बीकेज़ कहती तो हैं कि गीता का साकार भगवान ब्रह्मा की आत्मा कृष्ण नहीं है, शिव है; परन्तु शिव के साकार मूर्ति शंकर को नहीं मानतीं। ब्रह्मा उर्फ कृष्ण को ही गीता का साकार भगवान मानती हैं।
*पीबीकेज़ का कहना है गीता का ज्ञान देने वाला साकार भगवान क्राइस्ट, बुद्ध और नानक से भी ज्यादा निराकारी स्टेज वाला शिव-शंकर भोलेनाथ है। जैसे कि महात्मा बुद्ध, क्राइस्ट, गुरुनानक आदि धर्मपिताएँ भी ऊपर चढ़ी हुई निराकारी आँखों वाले दिखाई देते हैं।
33. बीकेज़:- मुरलियों में एक तरफ आया
‘‘सतयुग में तो बुद्धू होंगे। इन ल.ना. को कुछ भी नालेज नहीं। (मु.17.4.71 पृ.3 अंत) प्रूफ देखें
दूसरी तरफ आया ‘‘यह ल.ना. मालिक थे ना। इतने समझदार थे तब तो भक्तिमार्ग में भी पूजे जाते हैं।’’ (मु.27.5.68 पृ.1आदि) प्रूफ देखें
इस बात को ब्र.कु. समझ नहीं पातीं तो कहती हैं शिवबाबा की तो लहर है, कुछ भी बोलता रहता है। बीकेज़ कहते तो हैं कि ब्रह्मा वाली आत्मा सतयुग में नारायण टाइटलधारी महाराजा बनेगी; परन्तु यह नहीं बतातीं- कृष्ण को महाराजा का टाइटिल देने वाले माँ-बाप कौन होंगे और उन्हें सतयुग में राजाई का वर्सा किससे मिलेगा।
*पीबीकेज़ का कहना है बाहुबल से कोई भी हिटलर-नेपोलियन ने विश्व की बादशाही नहीं पाई। वास्तव में इसी संगमयुगी जन्म में राजयोग का पुरुषार्थ करके डायरैक्ट नर से नारायण बनने वाले विश्व महाराजा कहलाते हैं, जो समझदार हैं और महाविनाश के बाद उनसे सतयुग में जन्म लेने वाले राधा-कृष्ण जैसे देवताएँ बुद्धू होते हैं; क्योंकि महाविनाश की महामृत्यु के बाद सारा ज्ञान भूल जाते हैं। राजयोग से विश्व महाराजन बनने वाले पुरुषार्थी नर अर्जुन को साक्षात् भगवान शिवशंकर से विश्व की बादशाही मिलती है। जबकि ब्रह्मा की आत्मा को कृष्ण प्रिन्स के रूप में विश्व महाराजन से सतयुगी बादशाही मिलती है, जिसे 500/700 करोड़ विश्व धर्मावलंबियों का विश्व नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सतयुग पहले जन्म की आबादी ही 9 लाख होती है।
34. बीकेज़ कहती हैं ब्रह्मा ही शिव भगवान का साकार रूप है। शिवशंकर में अंतर तो बताती हैं; परन्तु शंकर कौन है - यह नहीं बतातीं।
*पीबीकेज़ शिवशंकर में अंतर भी बताते हैं और शिव के सगुण अर्थात् साकार स्वरूप शंकर की पूरी बायोग्राफी भी बताते हैं।
35. बीकेज़:- शिव भगवान को अजन्मा, अयोनि, अकर्ता, अभोक्ता कहते हैं। कृष्ण तो जन्म-मृत्यु के फेरे में आता है। कृष्ण की आत्मा 84वें जन्म में ब्रह्मा बनती है। इसलिए कृष्ण भगवान हो नहीं सकता। एक ज्योतिबिन्दु शिव ही भगवान है।
*पीबीकेज़:- परमपिता परमात्मा शिव निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी हैं। शंकर ही शिव समान बनता है। शंकर को नग्न और तपस्या में लीन अर्थात् निराकारी दिखाया जाता है इसलिए प्रैक्टिकल में भगवान है और वो एक ही है जो निश्चय-अनिश्चय रूपी जन्म-मरण से भी परे है।
36.ब्र.वि.:- ब्रह्माकुमारियों में मुख्य प्रशासक, रथी-महारथी, जोन इन्चार्ज आदि होते हैं। शिवबाबा कहते हैं, ”आत्मा-2 भाई-2“। दूसरी बात, दुश्मन को भी गले लगाओ। कोई-2 भाई 5/10/20 साल से ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं, जिनके द्वारा एडवांस नॉलेज लेना शुरू करते ही वे उन बीकेज़ को नंबरवन दुश्मन समझने लगते हैं। सेवाकेंद्र में आने से मना किया जाता है और प्रताड़ित भी किया जाता है। भारतीय संविधान की 341वीं धारा की सारे भारत में धज्जियाँ ही उड़ाकर रख दी हैं।
*आ.वि. में भगवान बाप के सिवाय कोई रथी-महारथी, जोन इन्चार्ज आदि होते नहीं। शिवबाबा ही करन-करावनहार है। भगवान बाप के बच्चे ‘आत्मा-2, भाई-2’ की समानता का प्रेम से व्यवहार कर पुरुषार्थ करते हैं। शिवबाबा कहते हैं-“जो करेगा स¨ भरेगा, जो ढूँढ़ेगा वह पाएगा।” सूर्यवंशी बच्चों का लक्ष्य है - “मेरा तो एक शिवबाबा, दूसरा न कोई” और “एक भरोसा”,“एक बल”, “एक आस विश्वास” की धारणा को पालन करने का पुरुषार्थ करते हैं।
37.ब्र.वि.:- शिवबाबा कहते हैं-”पूज्य बनने का आधार है पवित्रता“(ब्रह्मचर्य-मनसा, वाचा और कर्मणा)। शिवबाप ने टेम्पररी रथ ब्रह्मा द्वारा सिर्फ नं.वार ब्राह्मण धर्म स्थापन किया। किसी ब्रह्मा ने बाप समान निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी स्थिति नहीं बनाई। तथाकथित धक्का देकर चलने वाले पुष्करणी ब्राह्मण ही ब्रह्मा की पूजा करते हैं।
* आ.वि. में शिवबाबा विश्व-परिवर्तन का महान कार्य प्रजापिता ब्रह्मा अर्थात् शंकर द्वारा संपन्न कर रहे हैं। नर्क को स्वर्ग बनाना यह मासी का घर नहीं। शंकर महादेव ही बाप समान सगुणमयी 32 गुणों वाली महादेव की स्टेज को प्राप्त करता है। इसलिए शंकर की पूजा होती, मंदिर बनते हैं और उत्खनन में शंकर की सर्वाधिक नग्न मूर्तियाँ मिलती हैं; क्योंकि योगीश्वर शंकर महादेव द्वारा ही देवता धर्म की स्थापना होती है; क्योंकि डॉक्टर की डिग्री पाने वाला ही डॉक्टर बनाता है।
38.ब्र.वि. महल, माड़ियाँ, अटारियाँ बनाकर, 36 प्रकार के भोग खाने में और उसके सदस्य सिर्फ झकाझक श्वेत वस्त्र पहनने में अपने को श्रेष्ठ मानकर चलते हैं। पश्चिम में पश्चिमी सभ्यता के प्रतीक श्रीनाथ के मंदिर की तरह 56 प्रकार का भोग लगाया जाता है और बड़े-2 साहूकारों को वह भोग बेचा भी जाता है। धामा खाने वाले ब्राह्मण खाने-पीने में रुचि रखते हैं।
*आ.वि. में पूर्वी सभ्यता के प्रतीक जगन्नाथ की तरह रहन, सहन, खान, पान, पहनावे में सादगी को ही श्रेष्ठ मानकर चलता है। बुद्धि रूपी पॉकेट में त्रिमूर्ति शिव का ज्ञान धारण करते हैं। स्थूल पॉकेट में त्रिमूर्ति बैज लगाने का दिखावा नहीं करते। सिर्फ दाल-चावल (खिचड़ी) का भोग लगाया जाता है; जैसे जगन्नाथ के मंदिर में। कथावाचक ब्राह्मण खाने में रुचि नहीं रखते। धामा खाने वाले ब्राह्मण तो ढेर के ढेर तादाद में, भोग लगाने वाले अलग ही होते हैं।
39.बीकेज़ में ब्रह्मा का फोटो लगाते हैं जबकि शिवबाबा ने मुरली में कहा-
‘‘ब्रह्मा को याद करने से विकर्म विनाश नहीं होंगे। कोई न कोई पाप हो जावेगा। इसलिए उनका फोटो भी न रखो।’’ (मु.17.5.71 पृ.4 मध्य) प्रूफ देखें
हार्टफेल होने वाली पतित-भोगी आत्मा को याद करेंगे तो पतित हो पड़ेंगे; क्योंकि मुरली में बोला है योगी का कभी हार्टफेल नहीं हो सकता।
*पीबीकेज़ ब्रह्मा का या किसी भी देहधारी का फोटो नहीं लगाते।
40.बीकेज़ कहते हैं कि अभी महाभारी महाभारत तृतीय विश्वयुद्ध सामने खड़ा है; जबकि बीकेज़ अंडरग्राउंड काँक्रीट के महल-माड़ियाँ अपने ही भोग-विलास के लिए बनाते रहते हैं। और नाच-गानों के साथ भक्तिमार्ग के जन्माष्टमी, दशहरा, दीपावली उत्सवों में हर्ष-उल्लास मनाते रहते हैं।
*पीबीकेज़ मानते हैं कि महाभारी महाविनाश का तृतीय विश्वयुद्ध हिंदुस्तान-पाकिस्तान या हिंदू-मुसलमान की लड़ाई के रूप में सामने खड़ा है; इसलिए कोई प्रकार का उत्सव या शोर-शराबा नहीं करते।
41.बीकेज़:- माँग-2 कर चंदा इकट्ठा करके स्वार्थ पूर्ति के लिए अपने नाम से जीवन भर के लिए महल खड़ा कर लेते हैं। बूढ़ी-2 माताओं से लल्लू-चप्पू करके ज्ञान सुनाते हैं- विनाश होने वाला है, ऐसे बरगलाकर उनसे मकान अपने नाम करा लेते हैं।
*पीबीकेज़:- लीज में, किराए पर मकान लेते हैं। जैसे बाबा ने बोला है-
किराये में मकान लेते जाओ, अपना काम चलाते जाओ। ”मकान आदि खरीद भी नहीं करना है। शिवबाबा कहते हमको क्या पड़ा है जो मकान आदि लेवे फिर इतना भरकर देना पड़े। किराया पर लेते जाओ। (मु.18.9.68 पृ.2 मध्य) प्रूफ देखें
42. बीकेज़:- शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा के द्वारा संदेशियों के साक्षात्कार के आधार पर त्रिमूर्ति, सृष्टि-चक्र, लक्ष्मी-नारायण, कल्पवृक्ष- ये चार चित्र बनवाए थे। बाबा ने मुरलियों में इन चार चित्रों को मुख्य चित्र बताया है। फिर भी ब्रह्माकुमारियों ने इन मुख्य चार चित्रों को बिल्कुल छिपा दिया है। इसलिए छिपाया; क्योंकि एडवांस पार्टी में इनका सटीक क्लैरिफिकेशन दिया जाता है। जिसके आधार पर ब्रह्माकुमारियों की लूपोल्स (पोलपट्टी) खुल जाती है। बाबा ने भी कह दिया है-
 आसुरी मत पर ढेर-के-ढेर चित्र बने हैं। (मु. 8.5.74 पृ.1 मध्यांत) प्रूफ देखें
*एडवांस पार्टी में शिवबाबा की बताई हुई मुरलियों के अनुसार इन्हीं चार मुख्य चित्रों का क्लैरिफिकेशन दिया जाता है।
43.ब्रह्माकुमारियाँ कहती हैं कि पतित-पावनी गंगा नहीं है; लेकिन ये नहीं बताती हैं कि शंकर की जटाओं में विराजमान क्यों है?
*पीबीकेज़:- एडवांस पार्टी में बताते हैं कि शिव-शंकर से साकार संबंध जोड़ने के बाद ही गंगा शंकर की जटाओं में विराजमान होती है। संबंध साकार में इन्द्रियों के द्वारा ही जोड़े जाते हैं।
 अगर सागर से संबंध नहीं तो नदी भी नाला बन जाती (है)। (अ.वा.16.1.79 पृ.4 आदि) प्रूफ देखें
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